नवभारत विशेष: भारत-अमेरिका व्यापार समझौता अंतिम चरण में? जयशंकर-रूबियो की मुलाकात से बढ़ी उम्मीद

India US Trade Deal: मार्को रूबियो और एस. जयशंकर की मुलाकात में भारत-अमेरिका व्यापार, ऊर्जा, तकनीक और रक्षा सहयोग पर चर्चा हुई। वेनेजुएला के कच्चे तेल को लेकर संभावित सहयोग भी चर्चा का विषय है।
Marco Rubio Reliance Refinery Venezuela Oil
मार्को रूबियोफोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
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Highlights

  • मार्को रूबियो की भारत यात्रा के दौरान व्यापार समझौते को लेकर अहम चर्चा हुई।

  • 20 अक्टूबर को एस. जयशंकर और रूबियो ने व्यापार, ऊर्जा, तकनीक व रक्षा सहयोग पर बातचीत की।

  • रूबियो ने कहा कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के कुछ मुद्दे ही सुलझाने बाकी हैं।

  • जामनगर रिफाइनरी दौरे में रिलायंस द्वारा वेनेजुएला के कच्चे तेल के रिफाइनिंग की संभावनाओं पर चर्चा हुई।

Marco Rubio Reliance Refinery Venezuela Oil: अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की दो बार भारत यात्रा हो चुकी है। कूटनीतिक गलियारों में यह चर्चा शुरू हो गई कि आखिर रूबियो बार-बार भारत की यात्रा पर क्यों जा रहे हैं? इसके कई अनुमानित अर्थ निकाले गए।

मसलन चीन को लेकर रणनीति, भारत के साथ व्यापार के रिश्तों को बढ़ाना, रूस से भारत के संबंध और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन जैसे कई तरह के कयास लगाए गए। 20 अक्टूबर को देश की वित्तीय राजधानी मुंबई में जब विदेश मंत्री एस। जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री माकों रूबियों की मुलाकात हुई, तो इसका मतलब साफ था कि अब भारत और अमेरिका के बीच होने वाला व्यापार समझौता अंतिम चरणों में है।

मार्को रूबियों ने इस संबंध में खुद ही कहा कि अब बस दोनों देशों के बीच होने वाले समझौते के कुछ ही मसले सुलझाने बाकी हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा, तकनीक और रक्षा सहयोग पर विस्तार से चर्चा हुई। इसके बाद मार्को रूबियो जामनगर स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज की विशाल रिफाइनरी के दौरे पर गए।

दरअसल रूबियो यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि भारत की रिलायंस रिफाइनरी वेनेजुएला में ज्यादा तेल बनाने का समझौता करे। वास्तव में यह दौरा रिलायंस द्वारा वेनेजुएला के और ज्यादा कच्चे तेल को रिफाइन करने की संभावना तलाशने पर केंद्रित थी।

रूबियो की भारत यात्रा: तेल और व्यापार की कूटनीति

जामनगर स्थित रिलायंस की 2 रिफाइनरीज में हर दिन 14 लाख बैरल क्रूड ऑयल रिफाइन हो सकता है। वेनेजुएला का क्रूड ऑयल निम्न क्वालिटी का है और इसे सारी रिफाइनरीज साफ नहीं कर पाती। लेकिन जामनगर कॉम्प्लेक्स में स्थित रिलायंस की रिफाइनरीज वेनेजुएला के इस अल्ट्रा हेवी क्रूड ऑयल को प्रोसेस कर सकती हैं, जिनमें से कुछ का गाढ़ापन कीचड़ जैसे होता है। इसी साल जनवरी में ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने के बाद वेनेजुएला के तेल उत्पादन को बढ़ाने का निश्चिय किया है। इस तरह रूबियो का हाल में जल्दी-जल्दी दोबारा भारत आना अनौपचारिक कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं था, बल्कि यह यात्रा ठोस आर्थिक हितों के कारण की गई है।

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की राह लंबे समय से आसान नहीं साबित हो रही। दरअसल अमेरिका के शुल्क नीतियां और भारत की रूसी तेल खरीद को लेकर पैदा हुए तनाव ने व्यापार संबंधी बातचीत को बार-बार प्रभावित किया है। अमेरिका रणनीतिक साझेदारी की बात तो करता है, लेकिन आर्थिक हितों के मामले में कठोर सौदेबाजी से पीछे नहीं रहता। भारत के लिए भी अमेरिका बाजार का महत्व असंदिग्ध है। भारतीय वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात, निवेश, तकनीकी सहयोग और रोजगार के अवसरों पर व्यापार समझौते का असर पड़ सकता है। लेकिन किसी समझौते की सफलता केवल इस बात से नहीं आंकी जानी चाहिए कि उस पर कितनी जल्दी हस्ताक्षर हुए।

तेल, टैरिफ और हिंद-प्रशांत की रणनीतिक अहमियत

असली कसौटी यह है कि बाजार तक पहुंच, शुल्क, कृषि, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और निवेश के नियम दोनो पक्षों के लिए कितने संतुलित हैं। इसी बीच अमेरिकी प्रशासन ने खुद रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर प्रस्तावित दंडात्मक शुल्कों से जुड़ी कुछ पाबंदियों को अस्थायी रूप से हटाया है, जिनमें भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी भी आती है। अमेरिका ने फिलहाल न सिर्फ भारत बल्कि चीन और कुछ और देशों पर लगाए जाने वाले इस टैरिफ को फिलहाल स्थगित कर दिया है।

भारत को तेल आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाने की जरूरत है और इससे हम किसी तात्कालिक नीति के समर्थन का आधार नहीं मानेंगे। वैसे भी किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता, चाहे वह रूस पर ही क्यों न हो, दीर्घकालिक स्तर पर रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकती है। भारत में बार-बार आ रहे अमेरिकी विदेश मंत्री का एक कारण चीन और बदलती विश्व व्यवस्था है। क्योंकि व्यापार और ऊर्जा के विवादों के बावजूद भारत और अमेरिका के रिश्तों का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक आधार हिंद-प्रशांत क्षेत्र ही है।

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इसके अनेक कारण हैं

चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक शक्ति दोनों देशों के लिए अलग-अलग कारणों से चुनौती बनती है। अमेरिका भारत को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में महत्वपूर्ण साझेदार मानता है। जबकि भारत समुद्री सुरक्षा, रक्षा, तकनीक, खुफिया सहयोग और आधुनिक सैन्य क्षमताओं के विकास में अमेरिका से लाभ उठाना चाहता है।

सीमा विवाद, क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक प्रतिस्पर्धा को लेकर भारत की अपनी प्राथमिकताएं हैं। इसलिए मार्को रूबियो की बार-बार यात्रा से यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि भारत-अमेरिका संबंधों का कोई स्वर्णिम अध्याय शुरू हो गया है।

लेख-लोकमित्र गौतम के द्वारा

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