Explainer: चुनाव आयोग के अंदर कब-कब छिड़ी जंग? टीएन शेषन से अशोक लवासा तक, अंदरूनी विवाद की पूरी कहानी

Election Commission Dispute: चुनाव आयोग में असहमति का इतिहास पुराना है। टीएन शेषन से अशोक लवासा तक कई विवाद सामने आए। जानिए आयोग के भीतर अधिकारों, फैसलों और निष्पक्षता को लेकर कब-कब टकराव हुआ।
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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमारSource- Social Media
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Highlights

  • 1989 में पहली बार बहुसदस्यीय बना चुनाव आयोग, लेकिन जनवरी 1990 में फिर एक सदस्यीय हो गया।

  • 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने टीएन शेषन मामले में CEC को 'बराबरी वालों में प्रथम' बताया।

  • 2006-2009 में नवीन चावला को हटाने की सिफारिश और 2019 में अशोक लवासा की असहमति से चुनाव आयोग चर्चा में रहा।

Election Commission Conflict History: लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव को निष्पक्ष कराने की जिम्मेदारी जिस ढाल पर होती है, जब उस मजबूत ढाल में ही अंदरूनी दरारें दिखने लगें, तो सवाल उठना लाज़मी है। दिल्ली के सियासी गलियारों में इन दिनों हलचल तेज है। देश की सबसे भरोसेमंद संवैधानिक संस्थाओं में से एक चुनाव आयोग एक बार फिर अपनी ही चौखट के भीतर उठती असहमति की आवाजों को लेकर सुर्खियों में है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में उपजा यह ताजा विवाद कोई अकेला वाकया नहीं है। इससे पहले भी इस तरह के विवाद सामने आ चुके हैं।

'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक चौंकाने वाली पड़ताल ने इस अंदरूनी खींचतान की परतों को उधेड़ कर रख दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 10 महीनों के भीतर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम से कम 14 बार औपचारिक तौर पर अपनी सख्त आपत्ति दर्ज कराई। मुद्दा बेहद गंभीर था मतदाता पंजीकरण के फॉर्म-6 में बदलाव से लेकर मतदाता सूची से नाम जोड़ने-हटाने और वोटरों के डेटाबेस पर केंद्रीकृत नियंत्रण जैसे बड़े फैसले, जो कथित तौर पर उनकी जानकारी या सहमति के बिना जारी कर दिए गए।

हालांकि, चुनाव आयोग ने इन बातों को खारिज करते हुए इसे बहस की स्वाभाविक प्रक्रिया और फैसलों को 'सर्वसम्मति' से लिया गया करार दिया है। लेकिन सवाल फिर भी तैर रहा है, क्या यह सिर्फ नीतिगत असहमति है या लोकतंत्र की इस मजबूत नींव के भीतर कोई खेला चल रहा है?

इसे समझने के लिए हमें आज की सुर्खियों से थोड़ा पीछे मुड़कर देखना होगा टी.एन. शेषन के उस दौर से लेकर अशोक लवासा के साहसिक बगावती तेवरों तक, जब चुनाव आयोग के भीतर की असहमति ने कई बार देश के राजनीतिक पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया था। आइए समझते हैं चुनाव आयोग के भीतर पहले हुए विवादों को सिलसिलेवार तरीके से....

1989 में पहली बार बना बहुसदस्यीय चुनाव आयोग

अक्टूबर 1989 में एसएस धनाओ और वीएस सीगल को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। उस समय आरवीएस पेरी शास्त्री मुख्य चुनाव आयुक्त थे। इन नियुक्तियों के साथ चुनाव आयोग पहली बार बहुसदस्यीय निकाय बना। हालांकि, यह व्यवस्था ज्यादा समय तक नहीं चली। जनवरी 1990 तक दोनों चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियां रद्द कर दी गईं और आयोग फिर से एक सदस्यीय निकाय बन गया।

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चुनाव आयोग Source- Social Media

उस समय पेरी शास्त्री ने सार्वजनिक तौर पर इस व्यवस्था का विरोध नहीं किया था। हालांकि, इसे लेकर यह चर्चा रही कि नए सदस्यों की नियुक्ति से मुख्य चुनाव आयुक्त के अधिकारों और भूमिका पर असर पड़ सकता था।

टीएन शेषन के दौर में खुलकर सामने आया टकराव

1993 में चुनाव आयोग को फिर से बहुसदस्यीय बनाया गया। उस समय टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे, जबकि एमएस गिल और जीवीजी कृष्णमूर्ति को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। इसके बाद शेषन और दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच अधिकारों और कामकाज को लेकर टकराव सामने आया।

'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, शेषन ने दोनों चुनाव आयुक्तों को पर्याप्त भूमिका नहीं दी। उनके साथ आधिकारिक दस्तावेज साझा करने और महत्वपूर्ण बैठकों में शामिल करने को लेकर भी विवाद हुआ। रिपोर्टों में यह भी बताया गया कि शेषन ने एक इंटरव्यू में दोनों चुनाव आयुक्तों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था।

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टीएन शेषनSource- Social Media

शेषन का मानना था कि बहुसदस्यीय आयोग बनाने की व्यवस्था उनके कार्यालय की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है। दूसरी ओर, नए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के बाद आयोग के फैसलों में सामूहिक भूमिका और अधिकारों को लेकर सवाल उठने लगे।

सुप्रीम कोर्ट ने CEC को बताया था 'बराबरी वालों में प्रथम'

टीएन शेषन ने चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाने के सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। जुलाई 1995 में इस मामले पर फैसला सुनाते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के पास आयोग के कामकाज में समान दर्जे और निर्णय लेने की शक्तियां हैं।

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Supreme Court (फाइल फोटो)सोर्सः-सोशल मीडिया

अदालत ने मुख्य चुनाव आयुक्त को 'बराबरी वालों में प्रथम' यानी First Among Equals के रूप में देखा। इसका अर्थ यह था कि CEC का पद महत्वपूर्ण होने के बावजूद अन्य चुनाव आयुक्तों को केवल अधीनस्थ सदस्य नहीं माना जा सकता। यह फैसला चुनाव आयोग की सामूहिक कार्यप्रणाली को समझने के लिहाज से अहम माना जाता है।

2006-2009: एन गोपालस्वामी और नवीन चावला के बीच विवाद

चुनाव आयोग के भीतर अगला बड़ा विवाद तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी और चुनाव आयुक्त नवीन चावला के बीच सामने आया। यह विवाद 2006 से 2009 के बीच चर्चा में रहा।

अपने कार्यकाल के अंतिम महीनों में गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर नवीन चावला को चुनाव आयुक्त के पद से हटाने की सिफारिश की थी। उन्होंने चावला पर कांग्रेस के प्रति पक्षपात करने का आरोप लगाया था। गोपालस्वामी का दावा था कि चावला आयोग की बैठकों से जुड़ी जानकारी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं तक पहुंचाते थे।

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एन गोपालस्वामी और नवीन चावला Source- Social Media

हालांकि, तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने गोपालस्वामी की सिफारिश को स्वीकार नहीं किया। बाद में नवीन चावला ने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला। इस घटनाक्रम ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और उसके सदस्यों के बीच भरोसे को लेकर बहस छेड़ दी थी।

2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान मतभेद

2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा और चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के बीच मतभेद सामने आए। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ आदर्श आचार संहिता के कथित उल्लंघन से जुड़ी शिकायतों पर विचार करते समय लवासा ने कुछ फैसलों से असहमति जताई थी।

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तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ाSource- Social Media

लवासा ने इस बात पर भी आपत्ति जताई थी कि उनके असहमति वाले नोट आयोग के अंतिम आदेशों में दर्ज नहीं किए जा रहे थे। चुनाव आयोग ने उस समय स्पष्ट किया था कि असहमति वाले नोटों को सार्वजनिक करने का नियम सभी मामलों में एक जैसा नहीं है और यह संबंधित आदेश की प्रकृति पर निर्भर करता है। यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने चुनावी शिकायतों पर आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया और उसमें असहमति दर्ज करने के तरीके को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया।

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