आपातकाल, फोटो (सो.सोशल मीडिया)
आपातकाल एक ऐसी असाधारण स्थिति होती है, जिसमें चुनी हुई सरकार को सामान्य समय में मना किए गए नीतिगत फैसले लेने या कानून बनाने का विशेष अधिकार मिल जाता है। इस दौरान, नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को अस्थायी रूप से रोक दिया जाता है, और सरकार ऐसे कड़े उपाय लागू कर सकती है जो सामान्य हालात में संवैधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं होते।
भारत में अब तक तीन बार आपातकाल लागू किया गया है। पहला आपातकाल 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय घोषित किया गया था। दूसरी बार 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान आपातकाल लगाया गया। जबकि तीसरा और सबसे अधिक चर्चित आपातकाल 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा लागू किया गया था।
भारत में आपातकाल के दौरान कुछ गंभीर परिणाम सामने आए। इस अवधि में सरकार को यह अधिकार प्राप्त था कि वह देश के लिए खतरा माने जाने वाले व्यक्तियों को गिरफ्तार कर सके। उदाहरण के तौर पर, 1975 से 1977 के बीच निवारक निरोध कानूनों के आधार पर लगभग 1,11,000 लोगों को हिरासत में लिया गया। यह आंकड़ा बाद में शाह आयोग की रिपोर्ट में सामने आया।
इस दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों को असीमित अधिकार दिए गए, जिसके कारण हिरासत में यातना और कई मौतों की घटनाएं हुईं। इसके अलावा, इस दौरान गरीबों को बेदखल करने और जबरदस्ती नसबंदी जैसे मामले भी सामने आए। सबसे चिंताजनक पहलू यह था कि इस दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया और कई अलोकतांत्रिक कानून लागू किए गए, जिससे देश के संवैधानिक मूल्यों को गहरा आघात पहुंचा।
एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए 20 महीने के आपातकाल के दौरान लगभग 1,40,000 निर्दोष लोगों को बिना किसी औपचारिक आरोप के जेल में डाल दिया गया। इस अवधि में विपक्षी दलों के नेताओं के घरों पर अचानक छापे पड़े और उन्हें हिरासत में लिया गया। हिरासत में रखे गए लोगों को अक्सर यातनाएं दी जाती थीं, जिससे कई लोग शारीरिक और मानसिक रूप से प्रभावित हुए। कई मामलों में लोगों को उनके परिवारों को सूचित किए बिना ही गिरफ्तार कर लिया गया, जिसमें केवल संदेह या अफवाहों को आधार बनाया गया।
राजनीतिक कारणों से गिरफ्तार किए गए लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया और उन्हें कठोर यातनाएं दी गईं। इसके अलावा, भारत में मीडिया की स्वतंत्रता, जो लोकतंत्र का एक प्रमुख आधार मानी जाती है इस दौरान उसको भी गंभीर रूप से कुचल दिया गया। सरकार ने मीडिया पर कड़ा नियंत्रण स्थापित कर उसे अपने पक्ष में प्रचार का माध्यम बना लिया, जिससे लोकतांत्रिक मूल्यों को गहरा आघात पहुंचा।
बता दें कि इस आपातकाल के दौरान प्रसिद्ध गायक किशोर कुमार से पार्टी की रैली में प्रस्तुति देने की मांग की गई, जिसे उन्होंने नकार दिया। इसके जवाब में सरकार ने उनके गानों के प्रसारण पर राज्य के मीडिया में रोक लगा दी। इसके साथ ही, इस दौर में कई ऐसे नए कानून भी लाए गए जो कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना लागू किए गए। जिससे लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।