दारा शिकोह: वो मुगल जिसे मिली ‘पंडित’ की संज्ञा, तलवार नहीं कलम में था यकीं, खतरे में था ‘औरंग का इस्लाम’ तो कर दिया सर तन से जुदा
चारों तरफ औरंगजेब की क्रूरता और उसकी कब्र हटाने की चर्चाओं के बीच आज यानी गुरुवार 20 मार्च को उसके बड़े भाई दाराशिकोह जन्मदिन है। दाराशिकोह शाहजहां का बड़ा बेटा था। जिसे साम्प्रदायिक सियासत से ज्यादा अमन पसंद था।
- Written By: अभिषेक सिंह
दारा शिकोह (सोर्स- एआई)
नवभारत डेस्क: इस समय देश की सियासत में ‘औरंगजेब’ की आग फैली हुई है। दो दिन पहले नागपुर का महल इसी आग का निवाला बनते बनते रह गया। चारों तरफ औरंगजेब की क्रूरता और उसकी कब्र हटाने की चर्चाएं हैं। इस बीच आज यानी गुरुवार 20 मार्च को उसके बड़े भाई दाराशिकोह जन्मदिन है। दाराशिकोह शाहजहां का बड़ा बेटा था। जिसे साम्प्रदायिक सियासत से ज्यादा अमन पसंद था।
देवभाषा संस्कृत में रुचि होने के कारण मुसलमानों के काशी आने की परंपरा रही है। संस्कृत भाषा के आकर्षण से मुगल भी अछूते नहीं रहे। सत्रहवीं शताब्दी में शाहजहां के पुत्र दारा शिकोह भी संस्कृत, वेदांग, दर्शन आदि के ज्ञान की प्यास लेकर बनारस पहुंचे। उन्होंने बनारस में न केवल संस्कृत सीखी, बल्कि कई संस्कृत ग्रंथों का फारसी में अनुवाद भी किया।
काशी के पंडित ने क्यों दी शिक्षा
जब मुगल राजकुमार दारा शिकोह संस्कृत सीखने के लिए पंडित रामानंदपति त्रिपाठी के यहां पहुंचे, तब भी विरोध के स्वर उठे थे। इस पर पंडित रामानंदपति ने कहा था कि, ‘ज्ञान की प्यास लेकर दरवाजे पर आने वाले किसी भी व्यक्ति को शिक्षा का दान देना ब्राह्मणवाद है।’ बाद में दारा शिकोह के कहने पर पंडित रामानंदपति ने ‘विराट विवरणम’ लिखा।
सम्बंधित ख़बरें
8 जुलाई का इतिहास: ज्योति बसु और सौरव गांगुली से जुड़ा है यह खास दिन
5 साल की उम्र में फिल्मों में आई थीं नीतू कपूर, पहली फिल्म में नहीं मिला था नाम, वैजयंतीमाला ने बदल दी किस्मत
Chandrashekhar Vaidya Birthday:13 साल में दूल्हा बने, 7वीं के बाद छूटी पढ़ाई, ‘रामायण’ ने बदली किस्मत
7 जुलाई का इतिहास : एमएस धोनी का जन्म, ल्यूमिर बंधुओं ने रखी भारतीय सिनेमा की नींव
इतिहासकार बताते हैं कि वे विनम्र और उदार हृदय के थे। दारा शिकोह एक विचारक, कवि, धर्मशास्त्री होने के साथ-साथ सैन्य मामलों के कुशल विशेषज्ञ भी थे। दारा को इस बात पर भी आश्चर्य हुआ कि सभी धर्मों के विद्वान अपनी-अपनी व्याख्याओं में उलझे हुए हैं और कभी यह नहीं समझ पाते कि इन सबका मूल सार एक ही है।
शाहजहां को प्रिय था दारा शिकोह
कहा जाता है कि बादशाह शाहजहां अपने बेटे दारा से इतना प्यार करते थे कि उन्होंने उसे किसी युद्ध में भाग नहीं लेने दिया। यह भी कहा जाता है कि अपने सभी बच्चों में से शाहजहां दारा शिकोह से सबसे ज्यादा प्यार करते थे, जो उनके अन्य बेटों को पसंद नहीं था। शाहजहां के इस प्यार ने दारा शिकोह और उनके छोटे भाइयों के बीच दरार पैदा कर दी।
शादी में खोल दिए गए ख़जाने
शाहजहां के दारा शिकोह के प्रति प्यार का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि शाहजहां ने उनकी शादी के लिए खजाना खोल दिया था। दारा की शादी मुगल इतिहास की सबसे महंगी शादी कही जाती है। आज के लिहाज से देखा जाए तो यह शादी बिजनेसमैन मुकेश अंबानी के बेटे अनंत की शादी से कई गुना महंगी थी।
उस समय इंग्लैंड से भारत आए पीटर मैंडी ने लिखा है कि उस शादी पर 32 लाख रुपए खर्च हुए थे, जिसमें से 16 लाख रुपए दारा की बड़ी बहन जहांआरा बेगम ने दिए थे। यह शादी 1 फरवरी 1633 को हुई थी। दावतों का सिलसिला 8 फरवरी तक चलता रहा। इस दौरान रात में इतने पटाखे फोड़े गए कि ऐसा लगा कि रात ही दिन में बदल गई है। कहा जाता है कि शादी के दिन पहनी गई दुल्हन की पोशाक की कीमत आठ लाख रुपए थी।
औरंग ने कर दिया सर तन से जुदा
इन कारणों के अलावा इतिहासकार यह भी कहते हैं कि दारा शिकोह के पिता समझ गए थे कि उनके बेटे ने भारत को समझ लिया है और वह शासन चलाने के लिए बेहतर साबित होगा लेकिन औरंगजेब ने बवाल मचा दिया। औरंगजेब को लगा कि अगर दारा शिकोह सफल हो गया तो इस्लाम खतरे में पड़ जाएगा। यही वजह है कि उसने दारा शिकोह का सिर काटकर उसका सिर शाहजहां के पास भेज दिया और खुद दिल्ली की गद्दी पर बैठ गया।
