

Jantar Mantar CJP Protest: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने करीब एक महीने पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपना विरोध प्रदर्शन शुरू किया था, वो अब पूरा हो चुका है। धर्मेंद्र प्रधान ने प्रदर्शन शुरू होने के 36 दिन बाद शानिवार को छात्रों की मांग मानते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जंतर-मंतर अब पूरी तरह से खाली हो चुका है। जंतर-मंतर पर कुछ छात्रों के साथ शुरू हुए प्रदर्शन धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गया था। सरकार के खिलाफ यह 14 साल में सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन था। इससे पहले 2012 में निर्भया कांड के समय इतने लोग जंतर-मंतर पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए जुटे थे। कॉकरोच जनता पार्टी का यह प्रदर्शन कामयाब रहा। लेकिन सवाल उठता है कि किसी कामयाब प्रदर्शन को कामयाब क्या बनाता है? वह क्या है जिससे कोई प्रदर्शन सफल या असफल होता है?
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्चर एरिका चेनोवेथ और मारिया स्टीफन ने 2011 में इसे लेकर एक अहम रिसर्च (Why Civil Resistance Works: The Strategic Logic of Nonviolent Conflict) की थी। उन्होंने 1900 से 2006 तक दुनियाभर में हुए 323 आंदोलनों का विश्लेषण किया था। इसके मुताबिक, किसी भी विरोद प्रदर्शन के कामयाब होने में दो फैक्टर सबले अहम है।
उदाहरण के लिए 22 फरवरी 1986 को फिलीपींस की राजधानी मनीला में लाखों लोग इकट्ठा हुए और तत्कालीन सरकार के खिलाफ मार्च निकाला। यह मार्च तत्कालीन राष्ट्रपति फर्डिनांद मार्कोस को हटाने के लिए था। मार्कोट दो दशकों से राष्ट्रपति पद पर थे। इस विरोध मार्च के तीसरे ही दिन मार्कोस को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था। फिलीपींस के लोगों ने बिना किसी हिंसा के दशकों से चली आ रही सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया था।
एरिका और मारिया ने कहा कि उन्होंने अपने विश्लेषण में पाया कि 53% आंदोलन जो सफल हुए वो अहिंसक और शांतिपूर्ण थे। वहीं, इन वर्षों में केवल 26% हिंसक आंदोलन ही सफल हो पाए थे। यानी, जिन आंदोलनों में हिंसा नहीं थी, वे बदलाव लाने में अधिक कामयाब रहे। जबकि हिंसक प्रदर्शनों के सफल होने की संभावना कम रही।
किताब में दावा किया गया है कि अहिंसक और शांतिपूर्ण आंदोलन इसलिए अधिक सफल होते हैं, क्योंकि उन्हें पूरी दुनिया का साथ मिलता है। यदि सरकार ऐसे आंदोलनों को कुचलने का प्रयास करती है तो यह उन पर बैकफायर भी कर सकता है। यही वजह है कि सरकारें शांतिपूर्ण आंदोलनों को कुचलने की जगह बातचीत से समाप्त करने की कोशिश करती हैं। जिससे इन आंदोलनों के सफल होने की संभावना बढ़ जाती है।
एरिका और मारिया के मुताबिक, लोग हिंसक आंदोलनों से अधिक अहिंसक और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से अधिक जुड़ते हैं। एरिका और मारिया ने जिन आंदोलनों का विश्लेषण किया था, उनमें शांतिपूर्ण आंदोलनों में औसतन 2 लाख लोग शामिल हुए थे। वहीं, हिंसक आंदोलनों में 50 हजार की भीड़ जुटी थी। उदाहरण के लिए 1986 में राष्ट्रपति फर्डिनांद मार्कोस के खिलाफ हुआ प्रदर्शन जिसमें 20 लाख लोग जुटे थे।
एरिका और मारिया ने '3.5% Rule' का सिद्धांत दिया था। इसके मुताबिक, अगर किसी देश की कम से कम 3.5% आबादी किसी आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो जाए, तो उसके सफल होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। साल 2021 में एरिका चेनोवेथ ने इस सिद्धांत को समझाते हुए कहा था, "3.5% Rule का मतलब यह है कि जब किसी देश की करीब 3.5% आबादी किसी बड़े मुद्दे, जैसे आंदोलन, विरोध-प्रदर्शन या संघर्ष में सक्रिय रूप से भाग लेती है, तो ऐसी जनक्रांति के असफल होने की संभावना बेहद कम रह जाती है।
उन्होंने यह भी कहा था कि "3.5% संख्या सुनने में भले ही छोटी लगे, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर लोगों का किसी आंदोलन में उतरना इस बात का संकेत होता है कि उससे कहीं अधिक लोग, भले ही सड़कों पर न हों, लेकिन आंदोलन के उद्देश्य से सहमत हैं और उसका समर्थन करते हैं।
हालांकि, एरिका चेनोवेथ यह भी स्पष्ट करती हैं कि '3.5% Rule किसी आंदोलन की सफलता की गारंटी नहीं है। उनके मुताबिक, यह सिद्धांत कई मामलों में उपयोगी साबित हुआ है, लेकिन किसी भी आंदोलन की कामयाबी सिर्फ लोगों की संख्या पर निर्भर नहीं करती। उन्होंने कहा था, 3.5% का नियम कई परिस्थितियों में प्रभावी साबित हो सकता है, लेकिन किसी भी आंदोलन की सफलता के लिए मजबूत संगठन, प्रभावी नेतृत्व और लगातार बना रहने वाला मोमेंटम (Momentum) भी उतना ही जरूरी है। वास्तव में, 3.5% आबादी का समर्थन हासिल करने से पहले इन सभी कारकों का मजबूत होना आवश्यक है।
एरिका और मारिया मानते हैं कि '3.5% Rule' किसी आंदोलन की सफलता की गारंटी नहीं है, लेकिन इसे उसकी सफलता का सबसे प्रभावी संकेतक माना जाता है। जब बड़ी संख्या में लोग किसी आंदोलन से जुड़ते हैं, तो उन्हें व्यापक जनसमर्थन और सहानुभूति मिलने लगती है। इससे व्यवस्था के भीतर भी सोच बदलती है, जिसे एरिका चेनोवेथ 'वफादारी बदलना' कहती हैं।
इस प्रक्रिया से आंदोलन का प्रभाव लगातार बढ़ता है। हालांकि, सफलता केवल 3.5% आबादी जुटाने पर निर्भर नहीं करती। उनकी रिसर्च के अनुसार, 83% सफल अहिंसक आंदोलनों में यह नियम लागू नहीं हुआ था, जबकि बहरीन में 6% से अधिक भागीदारी के बावजूद आंदोलन असफल रहा था।