

नई दिल्ली: जाति जनगणना को लेकर देश में फिर से बहस तेज हो गई है। हालिया बयान में पूर्व मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि यदि इस प्रक्रिया को सिर्फ एक जाति कॉलम तक सीमित कर दिया गया, तो इसका कोई व्यापक सामाजिक या आर्थिक लाभ नहीं होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि यह केवल आंकड़ों की गिनती नहीं, बल्कि एक समग्र सर्वेक्षण होना चाहिए, जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलुओं को शामिल करे। उनका मानना है कि जब तक इसमें वास्तविक बजट और संरचनात्मक समर्थन नहीं होगा, तब तक इसका कार्यान्वयन अधूरा ही रहेगा।
उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि अभी तक जाति जनगणना को लेकर न तो कोई ठोस बजट आवंटन हुआ है और न ही कोई मजबूत नीति सामने आई है। यदि सरकार इसे गंभीरता से लागू करना चाहती है, तो उसे सभी राजनीतिक दलों की राय लेकर एक व्यापक प्रोफॉर्मा तैयार करना चाहिए। सिर्फ एक घोषणात्मक कदम उठाकर इसे मीडिया में प्रचारित करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए ठोस योजना और संसाधनों की जरूरत है।
सिर्फ कॉलम से नहीं चलेगा काम पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि जाति की गणना को केवल आंकड़े भरने की प्रक्रिया नहीं माना जा सकता। उन्होंने मांग की कि सरकार को विपक्ष के नेताओं से परामर्श लेकर विस्तृत प्रारूप तैयार करना चाहिए, जिसमें जाति के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक स्थिति, राजनीतिक भागीदारी और शिक्षा जैसे पहलुओं को भी शामिल किया जाए।
बजट और नीति का अभाव
हालांकि इस मुद्दे पर मंत्रिमंडल में चर्चा हो चुकी है और एक सार्वजनिक घोषणा भी की गई है, लेकिन अब तक इसे किसी नीति दस्तावेज में शामिल नहीं किया गया है। न ही इसके लिए कोई वित्तीय आवंटन या ढांचा तय किया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि इस प्रक्रिया को सही मायनों में लागू नहीं किया गया, तो क्या यह केवल एक चुनावी हथकंडा बनकर रह जाएगी?