

BJP MP Sudhanshu Trivedi in Navbharat Conclave 2026: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आयोजित 'नवभारत कॉन्क्लेव' के दौरान 'नव भारत विकसित भारत और नवराष्ट्र’ विषय पर चर्चा हुई। इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने प्रधानमंत्री मोदी के उस विजन को साझा किया, जो भारत को 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य रखता है। उन्होंने बताया कि अगले 21-22 सालों में भारत का स्वरूप कैसा होगा, इसे पिछले 12 सालों में हुए बदलावों से समझा जा सकता है।
सरकार के कामकाज को उन्होंने चार श्रेणियों में बांटा। पहली श्रेणी में वे काम हैं जो पहले भी होते थे, जैसे सड़क, रेल और एयरपोर्ट बनाना, लेकिन अब इनकी गति और पारदर्शिता में जमीन-आसमान का अंतर आ गया है। दूसरी श्रेणी उन कामों की है जो पिछली सरकारें करना तो चाहती थीं पर हिम्मत नहीं जुटा पाईं, जैसे जीएसटी लागू करना और महिला आरक्षण विधेयक।
कार्यक्रम में बोलते हुए भाजपा सांसद ने मोदी सरकार में हुए कई अहम बदलावों का जिक्र करते हुए विपक्षी दलों पर निशाना साधा। इस दौरान उन्होंने कहा कि पिछली सरकारें यह कहती थी कि हम ये होने देंगे ही नहीं। इनकी हैसियत नहीं की ये कभी कर दें। क्या धारा 370, 35A और राम जन्मभूमि, याद करिए जब ये कहा गया था जिस दिन धारा 370 हट जाएगी, उस दिन तिरेंगे को कंधा देने वाला कोई नहीं मिलेगा। लेकिन आज स्थिति क्या है, डल झील (श्रीनगर) पर तिरंगे की कतार दिखाई पड़ती है। यानी वो काम जिसको लेकर हमेशा ये यह कहा जाता रहा कि हम ये होने ही नहीं देंगे। लेकिन हमने ये कर दिखाया।
विकसित राष्ट्र बनने के लिए ऊर्जा की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। सुधांशु त्रिवेदी ने बताया कि 2014 तक भारत बिजली के लिए कोयले पर बहुत ज्यादा निर्भर था। लेकिन मोदी सरकार ने आते ही बिजली बचाने के लिए एलईडी बल्ब्स की शुरुआत की। सरकार ने अब तक 37 करोड़ एलईडी बल्ब्स बांटे हैं, जो अमेरिका की कुल आबादी से भी ज्यादा है।
सौर ऊर्जा के मामले में भारत ने जो लक्ष्य रखे थे, उन्हें समय से पहले ही पूरा कर लिया है। पहले 2030 तक 40% क्लीन एनर्जी का लक्ष्य था, जो 2022 में ही पूरा हो गया। अब 2030 तक का नया लक्ष्य 50% रखा गया है, जिसे 2025 तक हासिल कर लिया गया है। आज भारत की आधी ऊर्जा क्लीन सोर्सेज से आ रही है और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का मुख्यालय भी भारत के गुरुग्राम में है।
सुधांशु त्रिवेदी ने विज्ञान के प्रति पिछली सरकारों की सोच पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले हम सिर्फ पश्चिम के पिछलग्गू बने रहे। उन्होंने तर्क दिया कि यदि 1950 के दशक में एम्स (AIIMS) के साथ ‘आयुर्वेदिक एम्स’ भी बनाया गया होता, तो आज हल्दी, तुलसी और बासमती के पेटेंट के लिए हमें अमेरिका से लड़ना नहीं पड़ता। हमारे पास अपनी प्राचीन चिकित्सा पद्धति का एक मजबूत इकोसिस्टम होता।
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