(दिल्ली में आयोजित नवभारत कॉन्क्लेव के मंच पर बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी) 
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जापान ले गया नोबेल, वर्ना आयुर्वेद से भारत को पहले ही मिल जाता, नवभारत कॉन्क्लेव में बोले सुधांशु त्रिवेदी

Sudhanshu Trivedi in Navbharat Conclave: दिल्ली में आयोजित नवभारत कॉन्क्लेव में भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने प्रधानमंत्री मोदी के विकसित भारत 2047 के विजन को साझा किया।

मनोज आर्या

Sudhanshu Trivedi in Navbharat Conclave 2026: दिल्ली में आयोजित नवभारत कॉन्क्लेव के दौरान 'नव भारत, विकसित भारत और नवराष्ट्र' विषय पर चर्चा हुई। इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने प्रधानमंत्री मोदी के उस विजन को साझा किया, जो भारत को 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य रखता है। उन्होंने बताया कि अगले 21-22 सालों में भारत का स्वरूप कैसा होगा, इसे पिछले 12 सालों में हुए बदलावों से समझा जा सकता है।

सरकार के कामकाज को उन्होंने चार श्रेणियों में बांटा। पहली श्रेणी में वे काम हैं जो पहले भी होते थे, जैसे सड़क, रेल और एयरपोर्ट बनाना, लेकिन अब इनकी गति और पारदर्शिता में जमीन-आसमान का अंतर आ गया है। दूसरी श्रेणी उन कामों की है जो पिछली सरकारें करना तो चाहती थीं पर हिम्मत नहीं जुटा पाईं, जैसे जीएसटी लागू करना और महिला आरक्षण विधेयक।

ऊर्जा के क्षेत्र में एक बड़ी और अनूठी क्रांति

विकसित राष्ट्र बनने के लिए ऊर्जा की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। सुधांशु त्रिवेदी ने बताया कि 2014 तक भारत बिजली के लिए कोयले पर बहुत ज्यादा निर्भर था। लेकिन मोदी सरकार ने आते ही बिजली बचाने के लिए एलईडी बल्ब्स की शुरुआत की। सरकार ने अब तक 37 करोड़ एलईडी बल्ब्स बांटे हैं, जो अमेरिका की कुल आबादी से भी ज्यादा है।

क्लीन सोर्सेज से आ रही देश की आधी उर्जा

सौर ऊर्जा के मामले में भारत ने जो लक्ष्य रखे थे, उन्हें समय से पहले ही पूरा कर लिया है। पहले 2030 तक 40% क्लीन एनर्जी का लक्ष्य था, जो 2022 में ही पूरा हो गया। अब 2030 तक का नया लक्ष्य 50% रखा गया है, जिसे 2025 तक हासिल कर लिया गया है। आज भारत की आधी ऊर्जा क्लीन सोर्सेज से आ रही है और अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का मुख्यालय भी भारत के गुरुग्राम में है।

विज्ञान और आयुर्वेद पीछे छूट गए थे हम

सुधांशु त्रिवेदी ने विज्ञान के प्रति पिछली सरकारों की सोच पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले हम सिर्फ पश्चिम के पिछलग्गू बने रहे। उन्होंने तर्क दिया कि यदि 1950 के दशक में एम्स (AIIMS) के साथ 'आयुर्वेदिक एम्स' भी बनाया गया होता, तो आज हल्दी, तुलसी और बासमती के पेटेंट के लिए हमें अमेरिका से लड़ना नहीं पड़ता। हमारे पास अपनी प्राचीन चिकित्सा पद्धति का एक मजबूत इकोसिस्टम होता।

हमारे पास होता चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार

भाजपा के राज्यसभा सांसद और प्रवत्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि 2016 के चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार का उदाहरण दिया, जो जापानी वैज्ञानिक को 'व्रत रखने (फास्टिंग)' के फायदों पर रिसर्च के लिए मिला। उन्होंने कहा कि यदि भारत ने आयुर्वेद पर पहले ध्यान दिया होता, तो यह पुरस्कार दशकों पहले भारत को मिल जाता। आज खुशी की बात यह है कि WHO का 'सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन' भारत के जामनगर में बन रहा है।

https://youtu.be/QiX6nGnfrms?si=1kARAFiMzHf87tCk

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