BJP Foundation Day: इंदिरा की हत्या और कांग्रेस की लहर, पहले चुनाव में हार गई थी भाजपा; टूट गए थे अटल के इरादे
BJP Lost In 1984: 1984 का वो चुनाव जब महज 2 सीटों पर सिमट गई थी BJP। अटल जी भी हार गए थे चुनाव, जानें आडवाणी की आत्मकथा से उस करारी हार और फिर उठ खड़े होने की अनसुनी कहानी।
- Written By: सजल रघुवंशी
अटल और आडवाणी (सोर्स- सोशल मीडिया)
BJP History: 1984 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति के इतिहास में एक बड़ा मोड़ था, जिसने भारतीय जनता पार्टी को अंदर तक झकझोर दिया। आज जो पार्टी पूरे देश में सबसे मजबूत राजनीतिक ताकत है, वह उस दौर में अपने अस्तित्व को लेकर जूझ रही थी। यह कहानी सिर्फ ‘2 सीटों’ की नहीं बल्कि उस संघर्ष की है जिसने भारतीय जनता पार्टी की नींव को और मजबूत किया।
हालांकि उस समय बीजेपी की इस हार से अटल बिहारी बुरी तरह से टूट गए थे। भलें ही यह दौर बीजेपी के लिए कठिन जरूर था लेकिन इसी संघर्ष ने आगे चलकर उसे भारतीय राजनीति की एक मजबूत ताकत बनने की राह दिखाई।
1984 में बीजेपी की हार की वजह
अपनी आत्मकथा में आडवाणी लिखते हैं कि हमारी पार्टी को सबसे बड़ा धक्का 1984 में लगा। दरअसल, 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके आवास पर हत्या कर दी गई। देश शोक में डूबा हुआ था और इसी बीच उसी शाम राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने उनके पुत्र राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी। सिर्फ 40 साल की उम्र में राजीव गांधी देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने। सहानुभूति लहर इतनी प्रबल थी कि लोकसभा भंग कर 45 दिनों के अंदर चुनाव कराने का फैसला लिया गया। इस माहौल का सीधा असर बीजेपी पर पड़ा, जो इस चुनाव में बुरी तरह पिछड़ गई।
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सिर्फ 2 सीटों पर सिमटी बीजेपी
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी आत्मकथा मेरा देश, मेरा जीवन (My Country My Life) में लिखा है कि 1984 का चुनाव पार्टी के लिए सबसे बड़ा झटका था। 542 सीटों वाली लोकसभा में बीजेपी केवल 2 सीटें जीत सकी एक गुजरात और एक आंध्र प्रदेश से। चौंकाने वाली बात यह रही कि अटल बिहारी वाजपेयी भी चुनाव हार गए। वहीं कांग्रेस को 401 सीटों का ऐतिहासिक बहुमत मिला। इस करारी हार ने पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ दिया और संगठन गहरे संकट में आ गया।
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हार के बाद आत्ममंथन और नई शुरुआत
आडवाणी के अनुसार, 1985 में कोलकाता में हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में इस हार पर गंभीर चर्चा हुई। अटल बिहारी वाजपेयी ने अध्यक्ष के रूप में हार की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की पेशकश की, लेकिन पार्टी ने इसे ठुकरा दिया। इसके बावजूद उन्होंने आडवाणी पर अध्यक्ष पद संभालने का दबाव डाला और फिर मई 1986 में नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ स्टेडियम में हुए अधिवेशन में आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष चुना गया। यही वह क्षण था, जहां से बीजेपी और आडवाणी दोनों की राजनीतिक यात्रा का नया अध्याय शुरू हुआ।
