PM मोदी और अटल बिहारी वाजपेयी (डिजाइन फोटो)
नवभारत डेस्क: इमरजेंसी के विरोध के दौरान वजूद में आई जनता पार्टी के घटक इंदिरा गांधी के पतन के साथ फिर से अपनी पुरानी पहचान को लेकर सजग हो गए थे। सरकार से संगठन तक जनता पार्टी भीतरी उठापटक से जूझ रही थी। महज दो साल के भीतर मोरारजी सरकार का पतन हो गया। 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए बहुत मुकाबला आसान हो गया। जनता पार्टी लोकसभा में सिर्फ 32 सीटों पर सिमट गई। पराजय की हताशा के बीच बची-खुची जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता का विवाद भी गहरा गया।
इस दौरान जनसंघ निशाने पर थी। संघ या जनता पार्टी में उसे एक को चुनना था। अब जड़ों की ओर वापसी के अलावा कोई भी रास्ता शेष नहीं था। हालांकि, जनसंघ ने इस बार पुराना नाम छोड़कर नया नाम भारतीय जनता पार्टी स्वीकार किया। पार्टी के विस्तार तथा संघ से इतर वर्गों में स्वीकार्यता के लिए गांधीवादी समाजवाद का रास्ता अपनाया गया। लेकिन 1984 के नतीजों ने उसे फिर से पुरानी राह पर नई कोशिशों के साथ जुटने के लिए मजबूर कर दिया।
जनता पार्टी की टूट की कई वजहों में दोहरी सदस्यता का विवाद भी शामिल था। चौधरी चरण सिंह की अगुवाई में सोशलिस्ट अलग रास्ते पर चल चुके थे। लेकिन उनके पार्टी से अलग होने के बाद भी ये विवाद नहीं थमा। जनता पार्टी ने 1980 का लोकसभा चुनाव बाबू जगजीवनराम के फेस पर लड़ा था। इसम पार्टी बुरी तरह हारी। केवल 32 सीटों पर जीत मिली। इस हार ने जनता पार्टी की कलह को और बढ़ाया। जगजीवन राम तथा समर्थकों ने जनसंघ घटक के लोगों से जनता पार्टी या फिर RSS में से एक को चुनने का दबाव बनाया।
उस दौरान पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर बची खुची जनता पार्टी का और बिखराव नहीं चाहते थे। लेकिन उनकी सुलह की कोशिशें नाकाम रहीं। 4 अप्रैल 1980 को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने 14 के मुकाबले 17 मतों से फैसला कर दिया कि जनता पार्टी में बने रहने के लिए जनसंघ के लोगों को RSS का त्याग करना पड़ेगा। दिलचस्प है कि संघ के विरोध की अगुवाई करने वाले जगजीवनराम खुद अगले ही दिन वाई बी चह्वाण की अगुवाई वाली कांग्रेस (यू) में शामिल हो गए।
जनसंघ घटक के नेताओं से ज्यादा कार्यकर्ताओं का धैर्य इस समय तक खत्म हो रहा था। जनता पार्टी की सरकार और पार्टी को बचाने की कोशिशों की सबसे अधिक कीमत उन्हें ही चुकानी पड़ी थी। मजबूत कैडर और अन्य घटकों की तुलना में बड़े जनाधार के बाद भी उनको काफी झुकना पड़ा था। दोहरी सदस्यता के नाम पर पार्टी के भीतर उनकी हालत राजनीतिक अछूतों की तरह हो गई थी। लालकृष्ण आडवाणी के मुताबिक जनता पार्टी के गठन के समय पार्टी के शेष घटक जनसंघ के जुड़ने से खुश थे। लेकिन वक्त बीतने के साथ संघ से उनके संपर्कों को लेकर शिकायत होने लगी। जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के फैसले के बाद अब दो ही रास्ते थे। एक की पहले ही कमजोर हो चुकी जनता पार्टी में अगली टूट हो तथा जनसंघ उसकी अगुवाई करे। दूसरा कि जनसंघ को पुनर्जीवित किया जाए।
अब अटल-आडवाणी मान चुके थे कि फिर से पार्टी को खड़ा करना होगा। देरी का कोई भी मतलब नहीं था। आडवाणी ने ऐलान किया कि 5 और 6 अप्रैल 1980 को दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान में नई पार्टी का सम्मेलन होगा। कार्यकर्ताओं का जोश फिर से आ रहा था। 1500 प्रतिनिधियों की उपस्थिति का अनुमान था लेकिन करीब 3563 ने हिस्सेदारी की। अब सवाल यह था कि क्या पार्टी का नाम जनसंघ ही रहेगा? सोच बंटी हुई थी। इमरजेंसी के पहले जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के वक्त से ही जनसंघ का नेतृत्व पार्टी के आधार विस्तार की कोशिशों में लगा था। इस बात से अहसास था कि कांग्रेस से अकेले मुकाबला मुमकिन नहीं होगा। संघ से इतर वर्गों के बीच भी पकड़ और पहुंच बनानी होगी तथा इसके लिए लचीला रुख अपनाना होगा।
नई पार्टी के मंच पर दीनदयाल उपाध्याय के अलावा महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण की तस्वीरें इसी सोच का हिस्सा थीं। सम्मेलन में सिकंदर बख्त, शांतिभूषण तथा राम जेठमलानी जैसे नेता मौजूद थे और इसके जरिए संदेश देने की कोशिश की गई कि नई पार्टी अपने पुराने कैडर के साथ गांधी – जयप्रकाश के रास्ते चलने की तैयारी में है। इसके लिए पार्टी के पुराने नाम जनसंघ से भी परहेज किया।
इस दौरान भाषण में अटल जी ने इसकी वजह भी बताई। उनका कहना था कि जनता पार्टी की नीतियों तथा उसके कार्यक्रमों में कोई खामी नहीं थी। असल में लोगों ने राजनेताओं के व्यवहार के खिलाफ मतदान दिया। हम जनता पार्टी के अपने अनुभवों का लाभ उठायेंगे और हमें उसके साथ रहे संबंधों पर गर्व है। हम किसी तरह से अपने अतीत से अलग नहीं होना चाहेंगे।
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अपनी नई पार्टी बनाते हुए हम भविष्य की ओर देखते हैं, पीछे नहीं। हम अपनी मूल विचारधारा तथा सिद्धांतों के आधार पर आगे बढ़ेंगे। अटल जी ने नई पार्टी के नाम के लिए ‘ भारतीय जनता पार्टी ‘ प्रस्ताव रखा। नई पार्टी ने केवल जनसंघ के नाम ही नहीं बल्कि उसके चुनाव चिन्ह ‘ दिए ‘ का भी त्याग कर दिया। पार्टी के लिए नया चिन्ह ‘ कमल ‘ चुना गया। बता दें कि वही बीजेपी आज पूरे देश में राज कर रही है और पिछले टीन टर्म से केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है।