इंदिरा गांधी की सभा के दौरान की तस्वीर (सोर्स-सोशल मीडिया)
नवभारत डेस्क: आज यानी बुधवार 13 नवंबर को एक ऐसी महिला सियासी हस्ती का जन्मदिन है जिसका जन्म तो पाकिस्तान में हुआ था लेकिन नाम भारत की सियासत में हुआ। जिसकी इंदिरा गांधी का वरदहस्त और संजय गांधी की दोस्ती का तोहफा मिला हुआ था। जिसने इंदिरा का विरोध और हूटिंग करने वाले नौजवानों की भीड़ में घुसकर थप्पड़ बरसा दिए थे। जिसे देखने के बाद कई दिग्गज नेताओं ने दांतों तले उंगली दबा ली थी।
हम बात कर रहे हैं कांग्रेस की दिग्गज नेता और गांधी परिवार की करीबी रही अंबिका सोनी की। अंबिका सोनी का जन्म 13 नवंबर 1942 को अविभाजित भारत के लाहौर (अब पाकिस्तान) में हुआ था। आज उनका जन्मदिन है इस मौके पर हम उनके जीवन से जुड़ी एक ऐसी दास्तान लेकर आए हैं जो इसके पहले शायद ही आपने सुनी होगी।
यह 1975 का साल था, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद इंदिरा गांधी सकते में आ गई थीं। राज नारायण को उनकी चुनाव याचिका पर दोषी पाया गया था। रायबरेली से उनकी जीत रद्द कर दी गई थी। प्रधानमंत्री की कुर्सी खतरे में थी। दूसरी तरफ आरके धवन, बंसीलाल और संजय गांधी की तिकड़ी इंदिरा के समर्थन में लहर चलाने की तैयारी कर रही थी। संजय ने इस काम पर युवा कांग्रेस की अध्यक्ष अंबिका सोनी को भी लगा दिया। संजय के समर्थन से 33 वर्षीय अंबिका सोनी का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ रहा था।
अगले दिन सफदरजंग रोड पर इंदिरा के समर्थन में रैली की तैयारियां शुरू हो गईं। इंदिरा की लोकप्रियता की पुष्टि के लिए अंबिका ने शाम से ही तैयारी शुरू कर दी थी। संजय गांधी का साफ निर्देश था- जज कुछ भी कहें, जनता इंदिरा को ही अपना नेता मानती है। कांग्रेस अध्यक्ष देबकांत बरुआ ने ‘देश का नेता कैसा हो, इंदिरा गांधी जैसा हो’ की गूंज पूरे देश में फैला दी थी। अब इसकी परीक्षा की बारी थी। अंबिका ने युवा कांग्रेस से प्रस्ताव पारित करवा लिया। इंदिरा गांधी देश की निर्विवाद नेता हैं और उन्हें इस्तीफा देने की कोई जरूरत नहीं है।
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दूसरी ओर प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों ने बड़े ट्रांसपोर्टरों से संपर्क किया और गांवों में ट्रक भेजे गए। डीटीसी की बसें अचानक सड़कों से गायब हो गईं। अंबिका के निर्देश पर युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं के एक नेटवर्क ने इन बसों को दिल्ली के आसपास के इलाकों में भेजना शुरू कर दिया। आरके धवन ने सीधे पंजाब, हरियाणा, यूपी और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों को रैली में सभी सरकारी मशीनरी को लगाने का निर्देश दिया। यह पहली बार नहीं था जब पार्टी के टूटने पर इंदिरा ने अंबिका को साथ लिया हो।
1969 में जब इंदिरा ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और समाजवादी मोरारजी देसाई ने इसका कड़ा विरोध किया, तो इंदिरा के समर्थन में ऐसी ही एक आपातकालीन रैली आयोजित की गई थी। यह वह साल था जब सिंडिकेट ने इंदिरा को पार्टी से निकाल दिया था। इंदिरा ने कांग्रेस (आर) बनाई। तब उन्होंने अंबिका सोनी को पार्टी में शामिल किया था। अंबिका के पिता नकुल सेन वाधवा भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी थे। वे विभाजन के समय अमृतसर के कलेक्टर थे और जवाहरलाल नेहरू के करीबी थे।
इस लिहाज से गांधी परिवार में अंबिका का प्रवेश बेरोकटोक हुआ और वह करीबी रिश्ता आज भी कायम है। अगले दिन भारी भीड़ इंदिरा का स्वागत कर रही थी। इंदिरा आवास में 1969 से ही रेडीमेड मंच तैयार था, जब इंदिरा ने कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार संजीव रेड्डी की जगह वीवी गिरि को समर्थन देने का ऐलान किया था। इंदिरा इसी मंच से दहाड़ीं। यह दुनिया की सबसे बड़ी रैली है। मुझे साजिश के तहत फंसाया जा रहा है। मैं हर चुनौती का सामना करूंगी।
तभी भीड़ में से कुछ लोगों ने हूटिंग शुरू कर दी। इंदिरा गांधी इस्तीफा दो के नारे ने मंच पर मौजूद नेताओं को चौंका दिया। अचानक छह फुट लंबी अंबिका मंच से उतरीं और उस हिस्से की ओर बढ़ीं, जहां से इंदिरा विरोधी नारे लग रहे थे। अंबिका ने उस युवक पर थप्पड़ों की बरसात कर दी, जिस पर उन्हें शक था। इसके बाद मौके पर सुरक्षाकर्मी पहुंचे और प्रदर्शनकारियों को अरेस्ट कर लिया गया। आपातकाल लगाने के एक साल बाद 1976 में इंदिरा ने अंबिका सोनी को राज्यसभा का सदस्य बना दिया।
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