जयंती विशेष: जिसे ‘दाहिना हाथ’ मानतीं थी इंदिरा…उसी पर सोनिया को नहीं हुआ भरोसा, अधूरी रही ख्वाहिश
Pranab Mukherjee Birth Anniversary: एक ऐसा सियासतदान जिसे इंदिरा गांधी अपना दाहिना हाथ मानती थीं। लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया जब राजीव गांधी, सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी को ही उन पर भरोसा नहीं हुआ।
- Written By: अभिषेक सिंह
प्रणब मुखर्जी (सोर्स- सोशल मीडिया)
Pranab Mukherjee: एक ऐसा सियासतदान जिसे इंदिरा गांधी अपना दाहिना हाथ मानती थीं। जो इंदिरा गांधी के न रहने पर बड़ी बैठकों की अध्यक्षता करता था। जिनके लिए इंदिरा ने बाकायदा लेटर जारी कर रखा था। लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया जब राजीव गांधी, सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी को ही उन पर भरोसा नहीं हुआ।
हम बात कर रहे हैं पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की। आज यानी गुरुवार 11 दिसंबर को उनकी 90वीं जयंती है। अब वो हमारे बीच में नहीं हैं लेकिन उनकी कहानियां, उनकी यादें जिंदा हैं। तो चलिए हम आपको यह बताते हैं कि सोनिया और कांग्रेस को कब और क्यों उन पर भरोसा नहीं हुआ।
इंदिरा का निधन और सियासी संकट
31 अक्टूबर, 1984 की बात है। राजीव गांधी, प्रणब मुखर्जी, शीला दीक्षित, उमा शंकर दीक्षित, बलराम जाखड़, लोकसभा सेक्रेटरी जनरल सुभाष कश्यप और ए.बी. गनी खान चौधरी कोलकाता से दिल्ली जा रहे इंडियन एयरलाइंस के बोइंग 737 प्लेन में सवार थे। दोपहर 2:30 बजे, राजीव गांधी कॉकपिट से बाहर निकले और बताया कि इंदिरा गांधी नहीं रहीं।
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शुरुआती सदमा कम होने के बाद आगे क्या करना है, इस पर चर्चा शुरू हुई। प्रणब मुखर्जी ने बोलते हुए कहा, “नेहरू के समय से ही, ऐसे हालात में अंतरिम प्रधानमंत्री को शपथ दिलाने का रिवाज रहा है। नेहरू की मौत के बाद कैबिनेट में सबसे सीनियर मंत्री गुलजारी लाल नंदा को अंतरिम प्रधानमंत्री चुना गया।”
प्रणब के आंसुओं ‘नाटक’ समझा गया
मशहूर पत्रकार राशिद किदवई अपनी किताब, “24 अकबर रोड” में लिखते हैं कि एक कहानी यह है कि इंदिरा गांधी की मौत से दुखी प्रणब मुखर्जी प्लेन के टॉयलेट में गए और रोने लगे। उनकी आंखें लाल हो गईं, इसलिए वे प्लेन के पिछले हिस्से में जाकर बैठ गए।
प्रणब मुखर्जी व इंदिरा गांधी (सोर्स- सोशल मीडिया)
लेकिन कांग्रेस पार्टी में उनके विरोधियों ने इस इशारे को राजीव गांधी के खिलाफ साज़िश का सबूत बताया। एक और बात यह है कि जब राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री की मौत के बाद अपनाए जाने वाले प्रोसेस के बारे में पूछा, तो प्रणब मुखर्जी ने “सीनियरिटी” पर ज़्यादा ज़ोर दिया, जिसे बाद में प्रधानमंत्री बनने की उनकी इच्छा के सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया गया।
राजीव के पीएम बनने का किया समर्थन
इंदिरा गांधी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी पीसी अलेक्जेंडर ने अपनी ऑटोबायोग्राफी, “थ्रू द कॉरिडोर्स ऑफ़ पावर: एन इनसाइडर्स स्टोरी” में साफ लिखा है कि जैसे ही राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने की बात आई प्रणब मुखर्जी ने सबसे पहले इसका जोरदार सपोर्ट किया।
कांग्रेस छोड़कर बनाई थी अलग पार्टी
हालांकि तब तक राजीव गांधी नुकसान कर चुके थे। उन्होंने चुनाव जीतने के बाद अपनी कैबिनेट बनाई, तो प्रणब मुखर्जी को उसमें या कांग्रेस वर्किंग कमेटी में कोई जगह नहीं दी गई। उन्हें 1986 में पार्टी छोड़ने और एक अलग पार्टी, राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
1989 में राजीव के साथ हुआ पैचअप
हालांकि दो साल बाद 1989 में राजीव गांधी के साथ उनका समझौता हो गया था, लेकिन 1995 तक नरसिम्हा राव ने उन्हें विदेश मंत्री के तौर पर साउथ ब्लॉक का इंचार्ज नहीं बनाया था। लेकिन वित्तीय मामले हमेशा प्रणब मुखर्जी का पहला प्यार रहे, क्योंकि उन्होंने एक मामूली बंगाली कॉलेज में इकोनॉमिक्स पढ़ाया था।
इंदिरा गांधी मानती थी अपना दायां हाथ
प्रणब मुखर्जी के इंटेलेक्चुअल लेवल और काबिलियत को पहचानते हुए, इंदिरा गांधी ने एक लिखित ऑर्डर जारी किया कि प्रणब मुखर्जी उनकी गैरमौजूदगी में कैबिनेट मीटिंग की अध्यक्षता करेंगे। ऐसा शायद प्रणब मुखर्जी को पहले से पॉलिटिकल सपोर्ट न मिलने की वजह से हुआ था। उन्होंने 2004 में अपना पहला लोकसभा चुनाव जीता था।
दूसरी बार भी पीएम नहीं बने ‘प्रणब दा’
प्रणब मुखर्जी दूसरी बार प्राइम मिनिस्टर बनने का मौका तब चूके, जब सोनिया गांधी ने खुद यह पद ठुकराने के बाद पार्टी में नंबर दो मुखर्जी की जगह राज्यसभा में कांग्रेस के नेता मनमोहन सिंह को चुना। यह वही मनमोहन सिंह थे जिनके रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर पद के अपॉइंटमेंट लेटर पर इंदिरा गांधी के समय में फाइनेंस मिनिस्टर के तौर पर प्रणब मुखर्जी ने साइन किए थे।
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इसके बाद 2012 में कांग्रेस पार्टी ने उन्हें राष्ट्रपति पद के लिए अपना कैंडिडेट बनाया। लेकिन राजनैतिक टिप्पणीकारों का मानना था कि इस पोस्ट के लिए सोनिया गांधी की शुरुआती पसंद वाइस प्रेसिडेंट हामिद अंसारी थे। इस पोस्ट के लिए प्रणब पर विचार न करने के दो कारण थे। पहला उन पर अभी भी सरकार के नट-बोल्ट को टाइट करने की ज़िम्मेदारी थी। दूसरा सोनिया गांधी को अभी भी उनकी लॉयल्टी पर भरोसा नहीं था।
सोनिया को नहीं था ‘प्रणब दा’ पर भरोसा!
मुखर्जी ने अपनी ऑटोबायोग्राफी, “द कोएलिशन इयर्स” में लिखा, “सोनिया ने मुझसे कहा कि आप इस पोस्ट के लिए सबसे काबिल इंसान हैं। लेकिन आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकार चलाने में भी आपकी अहम भूमिका होती है। क्या आप कोई दूसरा ऑप्शन बता सकते हैं?” मुझे नहीं पता कि मुझे ऐसा क्यों लगा कि वह मनमोहन सिंह को प्रेसिडेंट और मुझे प्राइम मिनिस्टर बनाने के बारे में सोच रही होंगी।
