Gandhi Jayanti Vishesh | Internet Archive
नवभारत डेस्क : यह बात उस दौर की है जब मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे। दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के सफल प्रयोग के बाद भी भारत में गांधी जी के नाम का उतना असर नहीं था। उन्हें महात्मा या बापू की उपाधि अभी नहीं मिली थी। गांधी से महात्मा बनने की इस ऐतिहासिक यात्रा का पहला पड़ाव बिहार का चंपारण बना, जहां एक किसान, राजकुमार शुक्ल, ने अंग्रेजों के तीनकठिया कानून के खिलाफ आवाज उठाई।
दरअसल, साल 1916 में लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन आयोजित हुआ, जिसमें गांधी जी भी शामिल हुए। वहीं चंपारण के एक किसान, राजकुमार शुक्ल ने गांधी जी से मुलाकात की और चंपारण के नील किसानों के दुख-दर्द का ब्यौरा देते हुए उन्हें चंपारण आने का आग्रह किया। शुक्ल जी ने गांधी को बताया कि किस तरह से अंग्रेजों ने तीनकठिया कानून के जरिए चंपारण के किसानों पर अत्याचार किया। गांधी जी ने स्वीकार किया कि वे चंपारण की समस्याओं से अनभिज्ञ थे। उस समय तक उन्हें चंपारण के नील किसानों की दुर्दशा का कोई ज्ञान नहीं था। लेकिन, शुक्ल जी ने उन्हें बिहार आने का निमंत्रण दिया और वकील बाबू (ब्रजकिशोर प्रसाद) की मदद से पूरी जानकारी देने की बात कही।
चंपारण, जो नेपाल सीमा से सटा हुआ था, वहां अंग्रेजों ने तीनकठिया कानून लागू कर रखा था। इस कानून के अनुसार, किसानों को अपनी हर बीघे जमीन में से तीन कट्ठे जमीन पर अनिवार्य रूप से नील की खेती करनी पड़ती थी। यह नील अंग्रेजों के हित में था, और किसानों को इसके बदले कुछ भी प्राप्त नहीं होता था। इसके अलावा किसानों पर कई अन्य प्रकार के कर लगाए गए थे, जिससे वे भारी शोषण का शिकार हो गए थे। राजकुमार शुक्ल, जो खुद एक समृद्ध किसान थे, इस शोषण के खिलाफ खड़े हुए। अंग्रेजों ने उन्हें कई तरह से प्रताड़ित किया, लेकिन शुक्ल जी ने हार नहीं मानी और गांधी जी को चंपारण लाने का निर्णय लिया।
राजकुमार शुक्ल के निरंतर आग्रह के परिणामस्वरूप गांधी जी 1917 में चंपारण पहुंचे। यह गांधी जी के भारतीय राजनीति में प्रवेश का मुख्य मोड़ था। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में आजमाए गए सत्याग्रह और अहिंसा के अपने सिद्धांतों का पहला प्रयोग चंपारण में किया। यह आंदोलन न केवल चंपारण के नील किसानों को शोषण से मुक्ति दिलाने वाला साबित हुआ, बल्कि गांधी जी का राष्ट्रीय स्तर पर एक नेता के रूप में उदय भी हुआ। इस आंदोलन के जरिए भारत को गांधी जी के रूप में एक नया नेता और अहिंसक आंदोलन का एक नया तरीका मिला।
चंपारण आंदोलन ने गांधी जी को न केवल भारत में पहचान दिलाई, बल्कि उन्हें महात्मा और बापू की उपाधि भी दिलाई। यह कहा जा सकता है कि जैसे गंगा का उद्गम गंगोत्री से होता है, वैसे ही गांधी से महात्मा और बापू बनने की यात्रा का आरंभ चंपारण से हुआ।
राजकुमार शुक्ल का चंपारण आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने गांधी जी को चंपारण लाकर नील किसानों की समस्याओं को राष्ट्रीय पटल पर लाने में अहम भूमिका निभाई। स्वतंत्रता संग्राम के इस मुख्य नायक का योगदान धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में कहीं खो गया। 20 मई 1929 को मोतिहारी में उनकी मृत्यु हो गई। स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने उनके सम्मान में दो स्मारक डाक टिकट जारी किए, लेकिन उनकी याद को व्यापक पहचान नहीं मिल सकी, जिनके शुक्ल जी हकदार थें।
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