जयंती विशेष: वो शख्सियत जिसने देखा वकील बनने का ख़्वाब, लेकिन महात्मा गांधी से प्रेरित होकर समाजसेवा में खपाया पूरा जीवन
आज यानी 26 दिसंबर को महाराष्ट्र में जन्मे समाजसेवी बाबा आमटे की 110वीं जयंती हैं। बाबा आमटे की जयंती मानवता के प्रति उनके असाधारण योगदान की मार्मिक याद दिलाती है। उनकी जीवनी आज की पीढ़ियों को प्रेरित करती है।
- Written By: आकाश मसने
बाबा आमटे की जयंती (सोर्स: सोशल मीडिया)
नवभारत डेस्क: यदि आत्मविश्वास और निष्ठा हो, तो किसी भी कार्य को अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है। आज हम ऐसे ही एक समाजसेवी को याद करेंगे जिसने अपना पूरा जीवन समाज सेवा और भारत के आजादी के आंदोलन में लगा दिया। आज यानी 26 दिसंबर को महाराष्ट्र में जन्मे समाजसेवी बाबा आमटे की 110वीं जयंती हैं।
बाबा आमटे की जयंती मानवता के प्रति उनके असाधारण योगदान की मार्मिक याद दिलाती है। उनकी जीवनी आज की पीढ़ियों को प्रेरित करती है। साथ ही हमें करुणा और सामाजिक सक्रियता की परिवर्तनकारी शक्ति की याद दिलाती है।
बाबा आमटे का जीवन परिचय
मुरलीधर देवीदास आमटे, जिन्हें बाबा आमटे के नाम से जाना जाता है। वे एक सामाजिक कार्यकर्ता थे जिनकी मानवता के कल्याण के प्रति गहरी प्रतिबद्धता ने भारतीय समाज पर एक अमिट छाप छोड़ी। 26 दिसंबर, 1914 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले के हिंगनघाट में देवीदास आमटे और लक्ष्मीबाई के घर बेटे का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया मुरलीधर। बाद में मुरलीधर को बाबा आमटे के नाम से जाना जाने लगा।
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महात्मा गांधी से प्रेरित होकर समाज सेवा में सक्रिय हो गए
बाबा आमटे का जन्म एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा वर्धा और नागपुर से प्राप्त की। प्रारंभ में वे एक वकील बनना चाहते थे, लेकिन जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण बदल गया। वे महात्मा गांधी से प्रेरित होकर सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो गए। बाबा आमटे ने अपना जीवन हाशिये पर मौजूद और शोषितों, विशेषकर कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बाबा आमटे की भूमिका
बाबा आमटे को गांधी दर्शन के सबसे कट्टर अनुयायियों में से एक थे, जिन्हें अक्सर गांधी के आदर्शों का अंतिम पथप्रदर्शक भी माना जाता है। महात्मा गांधी से प्रेरित होकर, वह सक्रिय रूप से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए। गांधीजी के सिद्धांतों के प्रति बाबा आमटे की प्रतिबद्धता ने उन्हें महात्मा गांधी द्वारा किए विभिन्न आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया।
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1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बाबा आमटे ने बचाव पक्ष के वकील के रूप में अपनी कानूनी विशेषज्ञता की पेशकश करके स्वतंत्रता के संग्राम में सबसे आगे कदम रखा। उन्होंने उन नेताओं का प्रतिनिधित्व किया जिन्हें ब्रिटिश अधिकारियों ने आंदोलन में शामिल होने के कारण जेल में डाल दिया था। इससे औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान मिला।
समाज सेवा और आंदोलनों में योगदान
बाबा आमटे ने अपनी सामाजिक सेवा की शुरुआत हाथीपांव (विकलांगता) के शिकार लोगों के लिए की थी। उनका प्रमुख कार्य विकलांगों के लिए एक आश्रय स्थल बनाने का था। उन्होंने 1948 में आनंदवन नामक एक संस्था की स्थापना की, जो विकलांगों के लिए चिकित्सा, आवास, और रोजगार प्रदान करती थी।
इन अवॉर्डों से भी नवाजे गए समाजसेवी
बाबा आमटे को भारत सरकार ने 1971 पद्म श्री से नवाजा। इसके अला उनको 1985 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार, 1986 में पद्म विभूषण, 1988 में मानवाधिकार के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र पुरस्कार, 1991 में राइट लाइवलीहुड अवार्ड, 1999 में डॉ. अंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार, 1999 में गांधी शांति पुरस्कार, 1990 में टेम्पलटन पुरस्कार, 2004 महाराष्ट्र भूषण सहित कई पुरस्कार मिले।
