Bashir Badr Death: जब अपनी ही लिखी शायरी भूल गए थे बशीर बद्र, मेरठ दंगों ने छीन लिया सबकुछ, फिर…
Bashir Badr Passed Away: मशहूर शायर बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में निधन हो गया है। वह लंबे समय से डिमेंशिया की बीमारी से जूझ रहे थे। जानिए उनके बारे में ये खास बातें।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
शायर बशीर बद्र का निधन, फोटो- सोशल मीडिया
Padma Shri Bashir Badr Died at 91: मुसाफिर हैं हम भी मुसाफिर हो तुम भी किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी… आधुनिक गजल के उस्ताद माने जाने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में निधन हो गया है। उर्दू साहित्य में अपने अभूतपूर्व योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित बद्र साहब को आम बोलचाल की सरल और रूमानी भाषा में गजलें लिखने के लिए जाना जाता था।
उर्दू अदब (साहित्य) की दुनिया के एक चमकते सितारे बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन की खबर से उनके लाखों प्रशंसकों में शोक की लहर है। मखमली अहसासात और नाजुक जज्बात के इस शायर ने अपनी रचनाओं को लोगों की रूह तक उतारने का हुनर बखूबी सीखा था।
अयोध्या से AMU तक का सफर और संघर्ष
बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुआ था (कुछ दस्तावेजों में कानपुर का भी जिक्र है)। उनके जीवन का शुरुआती सफर काफी संघर्ष भरा रहा। पिता के देहांत के बाद घर की जिम्मेदारियों के कारण उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट गई और उन्हें मात्र 85 रुपये मासिक पर पुलिस की नौकरी करनी पड़ी। हालांकि, शायरी का शौक उन्हें बचपन से ही था और 20 साल की उम्र तक उनकी गजलें पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। बाद में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अपनी उच्च शिक्षा और पीएचडी पूरी की और वहीं उर्दू के प्रोफेसर के रूप में पढ़ाने लगे।
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मेरठ दंगों का दंश फिर भोपाल में बनाया बसेरा
बशीर बद्र के जीवन में एक दुखद मोड़ साल 1987 में आया, जब वे मेरठ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे। मेरठ के सांप्रदायिक दंगों में नफरत की आग ने उनके घर को जलाकर खाक कर दिया। इस हादसे में उनकी कई ऐतिहासिक और अप्रकाशित रचनाएं हमेशा के लिए नष्ट हो गईं। जिस शहर के लोग उनकी शायरी पर इतराते थे, वहां अपनों को पराया होता देख वे काफी आहत हुए और हमेशा के लिए भोपाल शिफ्ट हो गए।
विशाल भारद्वाज ने दोबारा लिखे थे शेर
दंगाइयों ने जब उनके घर को आग लगाई तो उनके जीवन भर की कमाई, नायाब किताबें, डिग्रियां और अप्रकाशित गजलें जलकर राख हो गईं। इस गहरे सदमे के कारण उन्होंने काफी समय तक लिखना भी छोड़ दिया था। गौरतलब है कि मशहूर फिल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज, जो उस समय उनके छात्र थे, ने अपनी याददाश्त के दम पर बद्र साहब की 90 फीसदी गजलें दोबारा लिखकर उन्हें सौंपी थीं। भोपाल में उनकी मुलाकात डॉ. राहत से हुई, जिनसे निकाह के बाद उनकी जिंदगी फिर पटरी पर लौटी।
बद्र साहब की सबसे बड़ी कामयाबी उनकी बोल-चाल की ठेठ और सरल भाषा थी। उन्होंने गजल विधा में कई नए और मौलिक शब्दों को शामिल किया, जिससे गजलें आम आदमी तक आसानी से पहुंच सकीं। उनकी भाषा में वह रवानगी और प्रवाह मिलता था जो बहुत कम शायरों में देखने को मिलता है।
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शायरी का अनूठा अंदाज, उर्दू के उस्ताद
बशीर बद्र को आधुनिक गजल का उस्ताद माना जाता है क्योंकि उन्होंने गजल को भारी-भरकम अरबी-फारसी शब्दों के जाल से निकालकर सरल और ठेठ हिंदुस्तानी भाषा (हिंदी-उर्दू का मिश्रण) में पिरोया। उनका मानना था कि शायरी दिल की आवाज होनी चाहिए ताकि वह आम आदमी के दिल-दिमाग को छू सके। उनकी गजलें आज भी भारतीय संसद में बड़े नेताओं और प्रधानमंत्रियों द्वारा अक्सर कोट की जाती हैं। उनके ये शेर कालजयी बन गए:
- उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।
- हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।
- मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला, अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला।
- तुम मोहब्बत को खेल कहते हो, हम ने बर्बाद जिंदगी कर ली।
- माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूं मैं, तू मेरा शौक देख, मेरा इंतजार देख।’
बशीर बद्र की लिखी चर्चित किताबें
साहित्य की दुनिया में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मश्री’ से नवाजा था। जीवन के अंतिम दौर में बढ़ती उम्र के कारण उनकी याददाश्त काफी कमजोर हो गई थी और वे लगभग सब कुछ भूल चुके थे। इसके अतिरिक्त उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। उनके कलाम के प्रमुख संग्रहों में ये शामिल हैं:
- इकाई
- इमेज
- आमद
- आस
- आसमान
- आहट
