सिर्फ धार्मिक महत्व ही नहीं स्वास्थ्य के लिए जरूरी है लोक पर्व छठ, जानिए इसके बारे में
Chhath Puja for Health: यह प्रकृति और विज्ञान का संगम होता है। यहां पर सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार माना गया है कि, यह आयुर्वेद और लोकसंस्कृति दोनों ने 'जीवन का संतुलन' माना जाता है।
- Written By: दीपिका पाल
छठ पूजा महत्व (सौ. सोशल मीडिया)
Chhath Pooja 2025: हिंदू धर्म में सभी व्रत और त्योहार का महत्व है। जहां पर उत्तरप्रदेश और बिहार राज्यों में आज से छठ पर्व की शुरुआत हो गई है। जब लोग छठ मईया के गीत गाते हुए डूबते और उगते सूरज को अर्घ्य देते हैं, तो यह केवल आस्था का क्षण नहीं होता—यह प्रकृति और विज्ञान का संगम होता है। यहां पर सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार माना गया है कि, यह आयुर्वेद और लोकसंस्कृति दोनों ने ‘जीवन का संतुलन’ माना जाता है।
केवल पूजा नहीं, बल्कि सूर्योपासना
यहां पर छठ पर्व की बात की जाए तो इसकी खास बात यह है कि, यह केवल पूजा नहीं, बल्कि सूर्योपासना माना जाता है। इसे लेकर वेदों में कहा गया है, “सूर्योऽत्मा जगतस्तस्थुषश्च,” यानी सूर्य समस्त जीवन की आत्मा है। वैज्ञानिक रूप से भी यही सत्य है। बात करें तो, सूर्य की रोशनी हमारे शरीर में विटामिन डी के निर्माण की प्राकृतिक प्रक्रिया को सक्रिय करती है, जो हड्डियों, प्रतिरक्षा तंत्र और मानसिक संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक है।
पौराणिक कथा में वर्णन
यहां पर छठ पूजा को लेकर पौराणिक कथा में वर्णन किया गया है। रामायण और महाभारत के अलावा विष्णु पुराण, देवीभागवत और ब्रह्मवैवर्त पुराण जैसे धर्मग्रंथों में छठ पर्व से जुड़े अनेक कथानकों के बारे में बताया गया है। कहा जाता है कि, इस पर्व की शुरुआत महाभारत काल में कर्ण ने की थी। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। च्यवन मुनि की पत्नी सुकन्या ने अपने बूढ़े हो चुके पति को पुनर्यौवन दिलाया था।
सम्बंधित ख़बरें
Premanand Maharaj: प्रेमानंद महाराज की भावुक अपील, नाम जप करते रहें; क्या है मंत्र जप के पीछे का साइंस
Mustard Oil Benefits: सरसों के तेल के इतने फायदे जानकर आप भी चौंक जाएंगे, जानें एक्सपर्ट की राय
Women at 40: 40 की उम्र के बाद महिलाओं को पसंद आ रहा है ‘Slow Life’, सुकून को दे रही प्राथमिकता, जानें क्यों?
Protein Deficiency: बार-बार थकान व कमजोरी, कहीं प्रोटीन की कमी तो नहीं; कैसे पहचानें और क्या खाएं
सूर्य की आराधना का महत्व
छठ पर्व में सूर्य की आराधना का महत्व होता है। इसमें सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों समय पूजा की परंपरा होती है। कहते हैं कि, वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सुबह 6 से 8 बजे और शाम 4 से 6 बजे तक की धूप यूवी-बी रे का सबसे संतुलित रूप होती है। ऐसी किरण जो त्वचा को नुकसान पहुंचाए बिना शरीर को पर्याप्त विटामिन डी प्रदान करती है। इस व्रत में छठ व्रत रखने वाले व्रती बिना किसी केमिकल लोशन या धूप से बचाव के सूर्य की किरणों को ग्रहण करती हैं, तो उनका शरीर प्राकृतिक रूप से डिटॉक्स होता है और कोशिकाओं में कैल्शियम-फॉस्फोरस संतुलन बनता है।
सूर्य की रोशनी में स्नान का ध्यान
आयुर्वेद में छठ पर्व को लेकर कहा गया है कि, इस व्रत में सूर्य नाड़ी शरीर की अग्नि (पाचन शक्ति) को नियंत्रित करती है। छठ व्रत में भोजन और जल का संयम, लगातार उपवास और ध्यान करने का नियम होता है जिसमें ये सभी हमारे एंडोक्राइन सिस्टम को संतुलित करते हैं। जब व्यक्ति सूर्य की रोशनी में स्नान कर ध्यान करता है, तो मेलाटोनिन और सेरोटोनिन हार्मोन सक्रिय होते हैं जिससे नींद और मूड में सुधार आता है साथ ही मानसिक स्थिरता मिलती है।
ये भी पढ़ें- आज का राशिफल- 25 अक्टूबर 2025: आज छठ पूजा का पहला दिन इन 5 राशियों के लिए बड़ा शुभ, जानिए बाकियों का
विटामिन डी की कमी से जूझ रहे लोग
भारत में विटामिन डी की कमी एक गंभीर समस्या बन चुकी है। अनुमान है कि शहरी आबादी का लगभग 70 फीसदी हिस्सा इससे प्रभावित है। यह कमी न केवल हड्डियों, बल्कि डिप्रेशन, थकान और इम्यूनिटी पर भी असर डालती है। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस की 2025 की एक रिपोर्ट में इसकी कमी को गंभीर समस्या माना गया है। इस रिपोर्ट में इसे “मूक महामारी” करार दिया गया। इसके अलावा, साइंस जर्नल नेचर की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में भारत के लगभग 49 करोड़ लोग विटामिन डी की कमी से जूझ रहे थे।
सन बाथ और हेलियोथेरेपी से मिलता है फायदा
ऐसे में छठ पूजा जैसी परंपराएं, जो प्राकृतिक धूप से जुड़ने का अवसर देती हैं, आज के तनावपूर्ण जीवन में और भी प्रासंगिक हो जाती हैं। जब परिवार घाटों पर घंटों सूर्य की ओर मुख किए खड़े रहते हैं, तो यह केवल धार्मिक अभ्यास नहीं बल्कि सस्टेनेबल हेल्थ थेरपी का रूप है।दिलचस्प है कि आज पश्चिमी देश ‘सन बाथ’ और ‘हेलियोथेरेपी’ को स्वास्थ्य के लिए आवश्यक मान रहे हैं, वही सिद्धांत जो भारत ने हजारों साल पहले छठ पूजा के रूप में अपनाया था। आयुर्वेद में जल-चिकित्सा का जिक्र है। इसमें ‘कटिस्नान’ को विशेष उपयोगी माना गया है ठीक वैसे जैसे कर्ण किया करते थे।
आईएएनएस के अनुसार
