Do Deewane Seher Mein Review: कमजोर कहानी और सुस्त रफ्तार ने बिगाड़ा सिद्धांत चतुर्वेदी-मृणाल ठाकुर का खेल

Siddhant-Mrunal Film Review: दो दीवाने सहर में सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर की जोड़ी आकर्षक है, लेकिन कमजोर कहानी और सुस्त रफ्तार फिल्म को संभाल नहीं पाती। फिल्म को 5 में से 2 स्टार्स दिए गए हैं।
Siddhant Chaturvedi Mrunal Thakur film do Deewane Seher Mein Review
दो दीवाने सहर में रिव्यू (फोटो- सोशल मीडिया)
Published on
Updated on

Mrunal Thakur Film Do Deewane Seher Mein Review: ‘दो दीवाने सहर में’ एक रोमांटिक ड्रामा के रूप में दर्शकों के सामने पेश की गई है। इसमें सिद्धांत चतुर्वेदी, मृणाल ठाकुर और इला अरुण अहम भूमिकाओं में नजर आते हैं। फिल्म का निर्देशन रवि उद्यावर ने किया है। हालांकि दिलचस्प स्टारकास्ट के बावजूद कहानी और प्रस्तुति दर्शकों पर खास प्रभाव छोड़ने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाती। फिल्म को 5 में से 2 स्टार्स की रेटिंग दी गई है। सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर की जोड़ी पर्दे पर प्यारी तो लगती है, लेकिन सिर्फ क्यूटनेस के दम पर दो घंटे की फिल्म झेलना दर्शकों के लिए मुश्किल है।

फिल्म की कहानी शशांक (सिद्धांत चतुर्वेदी) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव है लेकिन 'श' शब्द का सही उच्चारण नहीं कर पाता। इस छोटी सी कमी की वजह से उसका आत्मविश्वास डगमगाया हुआ है। दूसरी तरफ रोशनी (मृणाल ठाकुर) है, जो एक फैशन कंटेंट राइटर है लेकिन एक पुराने ब्रेकअप के बाद खुद को दुनिया से काट चुकी है। दोनों एक अरेंज मैरिज सेटअप में मिलते हैं, दोस्ती होती है, प्यार होता है और फिर शुरू होता है उनकी निजी असुरक्षाओं का टकराव। क्या वे अपनी झिझक मिटा पाएंगे? फिल्म इसी सवाल का जवाब ढूंढती है, लेकिन अफसोस कि यह सफर काफी उबाऊ है।

क्यों अखरती है यह फिल्म

फिल्म का सबसे बड़ा ड्राबैक इसमें किसी ठोस संघर्ष या ट्विस्ट का न होना है। कहानी बिना किसी उतार-चढ़ाव के एक ही लय में चलती रहती है, जो कुछ समय बाद बोरियत पैदा करने लगती है। दो घंटे से थोड़ी ज्यादा की यह फिल्म काफी खिंची हुई लगती है। ऊपर से बेवजह के गाने कहानी की रफ्तार को और सुस्त कर देते हैं। एक मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव जिसकी स्पीच में दिक्कत है, उसे वह नौकरी मिली ही कैसे? ऐसे कई सवाल फिल्म की राइटिंग पर निशान खड़े करते हैं। मृणाल का किरदार भी चश्मों के पीछे छिपकर जिस तरह की 'इनोसेंस' दिखाने की कोशिश करता है, वह काफी बनावटी लगता है।

अभिनय और तकनीकी पक्ष

सिद्धांत चतुर्वेदी ने मासूम दिखने की पूरी कोशिश की है, लेकिन उनका किरदार आधा-अधूरा लगता है। मृणाल ठाकुर खूबसूरत दिखी हैं, पर उनके अभिनय में वह गहराई नहीं दिखी जिसकी उम्मीद थी। सपोर्टिंग कास्ट में आयशा रज़ा और इला अरुण जैसे मंझे हुए कलाकार हैं, जिन्होंने अपना काम बखूबी किया है। निर्देशक रवि उदयवर ने मुंबई के शहरी जीवन और कॉर्पोरेट एंग्जायटी को दिखाने की कोशिश तो की है, लेकिन इसमें कुछ भी नयापन नहीं है। बॉडी शेमिंग, फैशन इंडस्ट्री का काला सच और ब्रेकअप ट्रॉमा इन विषयों पर हम पहले भी बहुत कुछ देख चुके हैं।

Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com