'बॉलीवुड अब फैमिली नहीं रहा', बढ़ते कंपटीशन पर छलका संजय दत्त का दर्द, हॉलीवुड की जमकर की तारीफ

Sanjay Dutt On Bollywood Competition: संजय दत्त ने बॉलीवुड में बढ़ते कंपटीशन, हॉलीवुड की एकजुटता और जेल में बिताए समय को लेकर खुलकर बात की। अभिनेता ने बताया कि एक कॉन्स्टेबल ने उन्हें माफ करना सिखाया।
Sanjay Dutt Interview Bollywood Competition Jail Munna Bhai
संजय दत्त (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)
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Sanjay Dutt Jail: बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त ने अपने लंबे फिल्मी करियर के दौरान कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। एक ओर उन्होंने सुपरहिट फिल्मों के जरिए दर्शकों के दिलों पर राज किया, तो दूसरी ओर निजी जिंदगी में भी कई मुश्किल दौर का सामना किया। हाल ही में एक इंटरव्यू में संजय दत्त ने अपनी जिंदगी से जुड़े कुछ अहम अनुभव साझा किए।

एक यूट्यूब चैनल को दिए इंटरव्यू में संजय दत्त ने कहा कि जब उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी, तब बॉलीवुड का माहौल आज की तुलना में काफी अलग था। उन्होंने बताया कि उस दौर में कलाकार एक-दूसरे का सहयोग करते थे और पूरी इंडस्ट्री एक परिवार जैसी महसूस होती थी। संजय ने कहा कि पहले सब एक-दूसरे की मदद करते थे, लेकिन अब इंडस्ट्री में कंपटीशन बहुत ज्यादा बढ़ गया है।

हॉलीवुड की एकजुटता की तारीफ

संजय दत्त ने बातचीत के दौरान हॉलीवुड की कार्यसंस्कृति की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि वहां अभिनेता, लेखक और तकनीकी कलाकार एक-दूसरे का समर्थन करते हैं। उन्होंने ऑस्कर अवॉर्ड्स का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कलाकारों के बीच ईर्ष्या कम और एक-दूसरे की सफलता का जश्न मनाने की भावना ज्यादा दिखाई देती है। उनके मुताबिक हॉलीवुड में हर कोई साथ खड़ा नजर आता है।

जेल में सीखा माफ करना

संजय दत्त ने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक जेल में सीखा। उन्होंने बताया कि एक कॉन्स्टेबल ने उन्हें 'माफ करना' सिखाया, जिसने उनकी सोच बदल दी। अभिनेता ने कहा कि एक कॉन्स्टेबल ने मुझसे कहा था कि लोगों को माफ करना सीखो। अगर किसी ने तुम्हें तकलीफ दी है, तब भी उसे माफ कर दो। इससे तुम जिंदगी में आगे बढ़ पाओगे। संजय के मुताबिक, यह सीख आज भी उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

मुन्ना भाई है सबसे खास किरदार

संजय दत्त ने अपने पसंदीदा किरदारों का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें गैंगस्टर की भूमिकाएं निभाना पसंद है, लेकिन 'मुन्ना भाई' उनके दिल के सबसे करीब है। उन्होंने कहा कि डॉक्टरों की व्यस्त जिंदगी के बीच मरीजों के साथ मानवीय व्यवहार भी उतना ही जरूरी है। किसी मरीज का हाथ पकड़कर यह पूछना कि वह कैसा है, इसमें सिर्फ दो मिनट लगते हैं, लेकिन उसके लिए यह बहुत मायने रखता है।

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