नुसरत भरूचा ने उज्जैन महाकाल के दरबार में टेका मत्था, पुत्रदा एकादशी पर भस्म आरती में हुईं शामिल

Nushrratt Bharuccha ने पुत्रदा एकादशी पर उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन किए और भस्म आरती में शामिल हुईं। उन्होंने कहा कि दर्शन से उन्हें शांति और ऊर्जा मिलती है।
Nushrratt Bharuccha Visits Mahakal
Nushrratt Bharuccha Visits Mahakal (फोटो क्रेडिट-इंस्टाग्राम)
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Nushrratt Bharuccha Visits Mahakal: बॉलीवुड अभिनेत्री नुसरत भरूचा मंगलवार को मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित प्रसिद्ध महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर पहुँचीं। उन्होंने पुत्रदा एकादशी के पावन अवसर पर बाबा महाकाल के दर्शन किए और मंदिर की सबसे विशेष भस्म आरती में शामिल होकर आशीर्वाद लिया।

इस दौरान अभिनेत्री पूरी तरह से भक्ति में लीन दिखाई दीं।

दूसरी बार हुईं भस्म आरती में शामिल

यह नुसरत भरूचा की बाबा महाकाल के दरबार में दूसरी यात्रा थी। भस्म आरती के दौरान वह नंदी हॉल में बैठी थीं और शिव भक्ति में पूरी तरह डूबी नजर आईं। दर्शन के बाद मंदिर के पुजारियों ने उन्हें प्रसाद स्वरूप महाकाल अंकित दुपट्टा भेंट किया, जिसे पाकर वह बहुत प्रसन्न हुईं।

नुसरत ने मंदिर की तारीफ की

नुसरत ने मंदिर की व्यवस्थाओं की दिल खोलकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि इतनी भारी भीड़ होने के बावजूद सभी व्यवस्थाएं बहुत सुगम और व्यवस्थित थीं।

ज्योतिर्लिंग पर जल चढ़ाने की सुविधा

खास तौर पर उन्होंने जल पात्र व्यवस्था की प्रशंसा की, जिसमें पाइप के जरिए भक्तों को लाइन में लगे बिना सीधे ज्योतिर्लिंग पर जल चढ़ाने की सुविधा मिलती है। नुसरत ने बताया कि बाबा महाकाल के दर्शन से उन्हें शांति और ऊर्जा मिलती है।

भस्म आरती का पौराणिक महत्व

भस्म आरती महाकाल मंदिर की सबसे विशेष आरती है, जो ब्रह्म मुहूर्त में की जाती है, जिसमें भस्म से भगवान शिव का श्रृंगार किया जाता है। यह आरती काफी लोकप्रिय है और इसमें शामिल होने के लिए दुनियाभर से श्रद्धालु उज्जैन आते हैं।

भस्म से भगवान शिव का श्रृंगार किया जाता है

पौराणिक महत्व के अनुसार, आरती में श्मशान से लाई गई चिता की भस्म से भगवान शिव का श्रृंगार किया जाता है। हालांकि, इसमें गोहरी, पीपल, पलाश, शमी और बेल की लकड़ियों की राख को भी मिलाया जाता है।

निराकार स्वरूप में होते हैं महाकालेश्वर

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भस्म आरती के दौरान महिलाएं सिर पर घूंघट या ओढ़नी डाल लेती हैं, क्योंकि मान्यता है कि उस समय महाकालेश्वर निराकार स्वरूप में होते हैं, और महिलाओं को निराकार स्वरूप को देखने की अनुमति नहीं होती है।

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