Kailash Kher Birthday: वड़ा पाव खाकर काटे थे दिन... 300 जिंगल्स गाने के बाद मिली पहचान, जानें कैसे बदली किस्मत

Kailash Kher Struggle Story: मेरठ से दिल्ली और फिर मुंबई तक का सफर तय करने वाले फेमस सिंगर कैलाश खेर आज अपना 52वां जन्मदिन मना रहे हैं, जिन्होंने कभी तंगहाली से परेशान होकर सुसाइड की कोशिश की थी।
Kailash Kher Birthday Special
कैलाश खेर (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)
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Kailash Kher Birthday Special: जब म्यूजिक इंडस्ट्री में एक अनोखी और रूहानी आवाज गूंजती है, तो हर कोई उस आवाज का दीवाना हो जाता है। वह आवाज किसी और की नहीं, बल्कि देश के चहेते सूफी गायक कैलाश खेर की है। आज 7 जुलाई को कैलाश खेर अपना 52वां जन्मदिन मना रहे हैं। संगीत जगत में अपनी अलग पहचान बनाने वाले कैलाश खेर की सफलता के पीछे संघर्ष की एक ऐसी दर्दनाक दास्तान छिपी है, जिसे सुनकर किसी की भी आंखें नम हो सकती हैं।

आज कैलाश खेर के जन्मदिन पर हम उनकी लाइफ के उन पन्नों को पलट रहे हैं, जो हर हताश व्यक्ति को जिंदगी में दोबारा खड़े होने की हिम्मत देते हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में 7 जुलाई 1973 को जन्मे कैाश खेर को बचपन से म्यूजिक को लेकर एक अजीब सा पागलपन था। वह भारतीय लोक संगीत और सूफी परंपरा के प्रति बेहद आकर्षित थे। म्यूजिक के इसी जुनून के कारण उनके परिवार में मतभेद होने लगे। आखिरकार उन्होंने बेहद कम उम्र में अपने सपनों के लिए एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया।

महज 14 साल की उम्र में छोड़ा अपनों का साथ

कैलाश खेर जब केवल 14 साल के थे तब वह अपने माता-पिता से लड़कर घर से भाग गए। मेरठ की गलियों को छोड़ वह अनजान रास्ते पर चलते हुए देश की राजधानी दिल्ली आ पहुंचे। दिल्ली में रहकर उन्होंने शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों जैसे कुमार गंधर्व, भीमसेन जोशी और नुसरत फतेह अली खान को सुनकर खुद को संवारना शुरू किया।

दिल्ली आने के बाद उनके रास्ते आसान नहीं थे बल्कि मुश्किलें हर रोज बढ़ती जा रही थीं। पेट भरने और गुजर-बसर करने के लिए उन्होंने कारोबार में हाथ आजमाने का फैसला किया। कैलाश ने एक एक्सपोर्ट का बिजनेस शुरू किया, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। इस कारोबार में उन्हें भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा।

जब जिंदगी से हारकर नदी में लगाई छलांग

कारोबार की असफलता ने उन्हें भीतर से बुरी तरह तोड़ दिया। वह डिप्रेशन में चले गए और शांति की तलाश में ऋषिकेश पहुंच गए। वहां उन्होंने संन्यासी बनने की भी कोशिश की। एक दिन निराशा के काले बादलों ने उन्हें इस कदर घेरा कि उन्होंने गंगा नदी में कूदकर सुसाइड करने की कोशिश भी की। हालांकि, वहां मौजूद एक शख्स ने उन्हें पानी से बाहर निकाला और उनकी जान बचाई।

वड़ा पाव खाकर मुंबई में काटी काली रातें

ऋषिकेश ने कैलाश खेर के सोचने का नजरिया बदल दिया। उन्हें अहसास हुआ कि भगवान ने उन्हें किसी बड़े मकसद के लिए जिंदा रखा है। दिल्ली में रहने के दौरान बॉलीवुड से जुड़े कुछ दोस्तों की राय पर उन्होंने मुंबई का रुख किया। मुंबई में भी काम पाने के लिए उन्हें भटकना पड़ा।

कई स्टूडियो के चक्कर काटने के बाद भी उन्हें निराशा ही हाथ लगती थी। उन दिनों उनके पास खाने तक के पैसे नहीं होते थे, इसलिए वह सिर्फ वड़ा पाव और चाय पीकर पूरा दिन गुजारते थे।

इसके बाद उनके एक दोस्त ने उनकी मुलाकात संगीतकार राम संपत से कराई, जो विज्ञापनों के लिए जिंगल्स बनाते थे। कैलाश की आवाज में वह जादू था कि उन्होंने देखते ही देखते पेप्सी और कोलगेट जैसे बड़े ब्रांड्स के लिए 300 से ज्यादा जिंगल्स गा डाले।

एक गाने ने रातोंरात बदला किस्मत का सितारा

विज्ञापनों की दुनिया में अपनी आवाज का लोहा मनवाने के बाद साल 2003 में उनकी किस्मत का बंद दरवाजा हमेशा के लिए खुल गया। उन्हें अक्षय कुमार की फिल्म 'अंदाज' में 'रब्बा इश्क ना होवे' गाना गाने का बड़ा मौका मिला। यह गाना रिलीज होते ही हर जुबान पर चढ़ गया और लोग इस नई आवाज के दीवाने हो गए।

इसके बाद उन्होंने 'तेरी दीवानी' और 'अल्लाह के बंदे' जैसे कालजयी सॉन्ग गाकर खुद को म्यूजिक इंडस्ट्री में स्थापित कर लिया। आज कैलाश खेर का नाम न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका यह सफर हमें सिखाता है कि अगर आपके भीतर अटूट संकल्प हो, तो आप मौत के मुंह से निकलकर भी सफलता का नया इतिहास लिख सकते हैं।

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