देविका रानी ने दिया पहला ब्रेक, देवदास और मुगल-ए-आजम ने बनाया ट्रेजिडी किंग, दिलीप कुमार की दिलचस्प कहानी

Dilip Kumar Career: दिलीप कुमार का सफर संघर्ष से शुरू होकर सफलता की मिसाल बना। पिता से मतभेद के बाद उन्होंने पुणे के आर्मी क्लब में सैंडविच बेचे, फिर देविका रानी की बदौलत फिल्मों में एंट्री मिली।
Dilip Kumar Death Anniversary Special Struggle Life Story Real Name
दिलीप कुमार (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)
Published on
Updated on

Dilip Kumar Death Anniversary Special Story: बॉलीवुड के दिग्गज दिवंगत एक्टर दिलीप कुमार की आज डेथ एनिवर्सरी है। दिलीप कुमार ने 7 जुलाई 2021 को इस दुनिया को अलविदा कह दिए थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि उनका सपना कभी अभिनेता बनने का नहीं था। वह तो अपने पिता के फलों के कारोबार में हाथ बंटाना चाहते थे। किस्मत ने ऐसा मोड़ लिया कि वही युवक आगे चलकर बॉलीवुड का ट्रेजेडी किंग बन गया।

दिलीप कुमार का असली नाम मुहम्मद यूसुफ खान था। उनके पिता फल बेचने का काम करते थे। साल 1930 में उनका परिवार मुंबई आ गया, लेकिन 1940 में पिता से मतभेद होने के बाद वह पुणे चले गए। यहां कैंटीन संचालक ताज मोहम्मद की मदद से उन्होंने एक आर्मी क्लब में सैंडविच स्टॉल लगाया। इस काम से उन्होंने करीब 5,000 रुपये बचाए, जिसके बाद मुंबई लौटकर नौकरी की तलाश शुरू की।

देविका रानी ने दिया फिल्मों में पहला मौका

मुंबई लौटने के बाद उनकी मुलाकात डॉ. मसानी के जरिए बॉम्बे टॉकीज की मालकिन देविका रानी से हुई। उन्होंने यूसुफ खान को नया नाम दिलीप कुमार दिया और 1944 में फिल्म ज्वार भाटा से अभिनय की दुनिया में लॉन्च किया। हालांकि असली पहचान उन्हें 1949 में आई फिल्म अंदाज से मिली। इसके बाद देवदास, दीदार, नया दौर, कोहिनूर, राम और श्याम, गंगा-जमुना और मुगल-ए-आजम जैसी फिल्मों ने उन्हें भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा सितारा बना दिया।

Dilip Kumar Death Anniversary Special Struggle Life Story Real Name

सायरा बानो संग अमर रही प्रेम कहानी

11 अक्टूबर 1966 को दिलीप कुमार ने अभिनेत्री सायरा बानो से शादी की। दोनों की उम्र में 22 साल का अंतर होने के बावजूद उनकी जोड़ी बॉलीवुड की सबसे चर्चित और सम्मानित जोड़ियों में गिनी जाती है। जीवन के कठिन दौर में भी सायरा बानो हर पल उनके साथ खड़ी रहीं और उनकी सबसे बड़ी ताकत बनीं।

सम्मान और विरासत

दिलीप कुमार 2000 में राज्यसभा सदस्य भी बने। उन्हें 1980 में मुंबई का शेरिफ बनाया गया और कई बार फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। संघर्ष से शुरू हुआ उनका सफर भारतीय सिनेमा के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। आज भी उनकी फिल्में, संवाद और अभिनय नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

Navbharat Live
navbharatlive.com