प्रयागराज माघ मेला 2026: जब कुंभ की भीड़ में बिछड़े भाई, सुपरहिट रहीं बॉलीवुड की ये यादगार फिल्में
Kumbh Mela Bollywood Movies: प्रयागराज माघ मेले के बीच जानें बॉलीवुड की उन सुपरहिट फिल्मों के बारे में, जिनकी कहानी कुंभ और संगम के मेलों में बिछड़ने और मिलने पर आधारित रही है।
- Written By: अनिल सिंह
Kumbh Mela Bollywood Movies (फोटो क्रेडिट-इंस्टाग्राम)
Kumbh Mela: प्रयागराज में माघ मेला 2026 अपनी पूरी रौनक पर है। संगम तट पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ रहा है, और आस्था की इस डुबकी की गूँज सदियों से बॉलीवुड फिल्मों में भी सुनाई देती रही है। हिंदी सिनेमा और कुंभ मेले का नाता दशकों पुराना है। बॉलीवुड के लिए कुंभ का मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भावनाओं, बिछड़ने और फिर मिलन की कहानियों का एक ऐसा ‘मंच’ रहा है, जिसने कई फिल्मों को सुपरहिट बनाया है।
चाहे वह जुड़वां भाइयों का बिछड़ना हो या नायक की अपनी पहचान की तलाश, कुंभ की भीड़ ने पटकथा लेखकों को हमेशा आकर्षित किया है। 1940 के दशक से लेकर 90 के दशक तक, ऐसी कई फिल्में आईं जिनके मुख्य दृश्य कुंभ या माघ मेले की पृष्ठभूमि पर आधारित थे। आइए जानते हैं उन यादगार फिल्मों के बारे में जिन्होंने संगम की रेती पर अपनी सफलता की कहानी लिखी।
‘तकदीर’ से ‘अधिकार’ तक: बिछड़ने और मिलने का क्लासिक सिनेमा
कुंभ मेले की भीड़ में बच्चों के बिछड़ने की थीम की शुरुआत साल 1943 में आई फिल्म ‘तकदीर’ से मानी जाती है। महबूब खान के निर्देशन में बनी इस फिल्म में नरगिस और मोतीलाल मुख्य भूमिका में थे। कहानी में दो बच्चे मेले में खो जाते हैं और सालों बाद उनकी मुलाकात होती है। इसके बाद साल 1954 में आई ‘अधिकार’ में किशोर कुमार और उषा किरण ने अपनी अदाकारी का जादू बिखेरा। इस फिल्म में कुंभ मेला नायक के आंतरिक संघर्ष और न्याय की लड़ाई को एक आध्यात्मिक गहराई प्रदान करता है।
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आध्यात्मिकता और आस्था का संगम: ‘कुंभ के मेले’ और ‘धर्मात्मा’
साल 1950 में रिलीज हुई फिल्म ‘कुंभ के मेले’ पूरी तरह से इस आयोजन की आध्यात्मिकता पर केंद्रित थी। यह फिल्म दिखाती है कि कैसे मोक्ष की तलाश में आए लोगों के जीवन संगम तट पर बदल जाते हैं। वहीं, साल 1975 की ब्लॉकबस्टर ‘धर्मात्मा’ में फिरोज खान और हेमा मालिनी के बीच का बिछड़ना आज भी दर्शकों को याद है। फिल्म का वह मशहूर डायलॉग, “यह मेला तो बस नाम है, यहां हर कोई अपनी किस्मत का सौदा करने आया है”, मेले की दिव्यता और मानवीय लालसा को बखूबी बयां करता है।
‘कुंभ की कसम’ और एक्शन का तड़का
90 के दशक में भी मेले का जादू कम नहीं हुआ। साल 1991 में आई ‘कुंभ की कसम‘ ने मेले के दृश्यों के साथ एक्शन और सस्पेंस का बेहतरीन मिश्रण पेश किया। तुकाराम काटे के निर्देशन में बनी इस फिल्म में भाग्य और दैवीय कृपा को कहानी का केंद्र बनाया गया था। इन सभी फिल्मों ने यह साबित किया कि कुंभ मेला केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक ऐसा पात्र है जो फिल्म की कहानी में जान फूंक देता है और उसे बॉक्स ऑफिस पर सफलता की ऊंचाइयों तक ले जाता है।
