क्या बंगाल में राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है? इसका वोटिंग पैटर्न पर क्या असर पड़ेगा? समझिए पूरा समीकरण
West Bengal Elections: पश्चिम बंगाल की राजनीति अब दो ध्रुवों के बीच सिमटती नजर आ रही है। टीएमसी और बीजेपी के बढ़ते वर्चस्व ने पारंपरिक दलों को हाशिए पर धकेलते हुए वोटिंग पैटर्न को पूरी तरह बदल दिया है।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
ममता बनर्जी और पीएम मोदी, फोटो- नवभारत
TMC vs BJP Politics: पश्चिम बंगाल की सियासी फिजा इन दिनों एक बड़े बदलाव की गवाह बन रही है। कभी विचारधारा और कैडर आधारित राजनीति के लिए पहचाने जाने वाले इस राज्य में अब समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। पिछले एक दशक के भीतर बंगाल की राजनीति में जो ध्रुवीकरण देखने को मिला है, उसने दशकों पुराने स्थापित दलों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
आज बंगाल का मुकाबला किसी तीसरे विकल्प की गुंजाइश छोड़ता नहीं दिखता। हर चुनाव के साथ यह खाई और गहरी होती जा रही है कि आप या तो इस तरफ हैं या उस तरफ। यह बदलाव केवल नेताओं के भाषणों तक सीमित नहीं है, बल्कि बंगाल के गांवों से लेकर शहरों तक के वोटिंग पैटर्न में भी साफ नजर आने लगा है।
आंकड़ों की जुबानी समझिए बंगाल में कैसे सिमटा तीसरा विकल्प
बंगाल के चुनावी इतिहास को देखें तो साल 2011 एक बड़ा मोड़ था, जब सत्ता परिवर्तन हुआ और टीएमसी का उभार हुआ। उस समय भाजपा का वजूद लगभग नगण्य था। साल 2016 तक भाजपा का वोट शेयर करीब 10 फीसदी तक पहुंचा, लेकिन असली धमाका 2021 के विधानसभा चुनाव में हुआ। इस चुनाव में भाजपा ने करीब 38 फीसदी वोट हासिल किए, वहीं टीएमसी 48 फीसदी के साथ सत्ता पर काबिज रही।
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इन दोनों बड़ी पार्टियों ने मिलकर कुल मतदान का 85 फीसदी से ज्यादा हिस्सा अपनी झोली में डाल लिया। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि कांग्रेस और वामपंथी दल, जो कभी बंगाल की सत्ता के केंद्र थे, अब पूरी तरह हाशिए पर जा चुके हैं। मतदाता अब किसी तीसरे विकल्प को चुनने के बजाय अपना वोट बर्बाद होने से बचाना चाहता है।
पहचान की राजनीति और बाहरी बनाम भीतरी का सियासी दांव
इस बढ़ते ध्रुवीकरण के पीछे पहचान की राजनीति का एक बड़ा हाथ रहा है। राज्य में अब धर्म, जाति और समुदाय के आधार पर लामबंदी बढ़ गई है। जहां एक ओर भाजपा ने हिंदुत्व और नागरिकता जैसे मुद्दों को हवा दी, वहीं टीएमसी ने क्षेत्रीय पहचान और अल्पसंख्यक हितों को अपना ढाल बनाया।
ममता बनर्जी ने भाजपा को बाहरी पार्टी बताकर बंगाली गौरव का जो नैरेटिव सेट किया, उसने क्षेत्रीय ध्रुवीकरण को और तेज कर दिया। चुनाव के दौरान खेला होबे और जय श्री राम जैसे नारों ने चुनावी माहौल को इतना आक्रामक बना दिया कि आम मतदाता वैचारिक तौर पर दो स्पष्ट खेमों में बंट गया। सोशल मीडिया पर छिड़े नैरेटिव वॉर ने इस ध्रुवीकरण को आग देने का काम किया।
वोटिंग के बदलते मिजाज ने कैसे बढ़ाई पार्टियों की धड़कनें
वोटिंग पैटर्न पर नजर डालें तो अब राज्य में स्विंग वोटर्स की संख्या लगातार कम हो रही है। पहले मतदाता चुनाव से ठीक पहले अपना मन बदलते थे, लेकिन अब पैटर्न काफी हद तक तय हो चुके हैं। अल्पसंख्यक वोटों का बड़ा हिस्सा टीएमसी की तरफ जा रहा है, जबकि बहुसंख्यक वोटों का एक बड़ा धड़ा भाजपा की ओर झुकता दिख रहा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि कई सीटों पर हार-जीत का अंतर बहुत कम रह गया है। क्षेत्रीय स्तर पर भी इसका प्रभाव साफ है। उत्तर बंगाल के जनजातीय और सीमावर्ती इलाकों में भाजपा मजबूत दिखती है, तो दक्षिण बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में टीएमसी का दबदबा बरकरार है।
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अगर ध्रुवीकरण इसी तरह जारी रहा, तो मुकाबला फिर से सीधा होगा और तीसरे दलों के लिए वापसी की राह मुश्किल हो जाएगी। हालांकि, यदि मतदाताओं का मिजाज बदला और ध्रुवीकरण की यह दीवार टूटी, तभी कांग्रेस या लेफ्ट जैसे दलों के लिए राजनीतिक जमीन तैयार हो पाएगी। फिलहाल बंगाल की राजनीति एक ऐसे दोराहे पर है जहां ध्रुवीकरण ही नया सामान्य बन गया है।
