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West Bengal Election 2026: कोलकाता के ठीक दूसरी तरफ हुगली नदी के किनारे बसा हावड़ा मध्य विधानसभा क्षेत्र इन दिनों सियासी चर्चाओं का केंद्र बना हुआ है। साल 2026 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही यहां के बाजारों और गलियों में चुनावी चर्चाएं तेज हो गई हैं। यह क्षेत्र न केवल अपने घने शहरी बसावट और व्यस्त बाजारों के लिए जाना जाता है, बल्कि यह पश्चिम बंगाल की राजनीति में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के एक मजबूत स्तंभ के रूप में भी उभरा है।
29 अप्रैल 2026 को जब इस क्षेत्र के मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे, तो उनके सामने पुराने रिकॉर्ड और भविष्य की नई उम्मीदें दोनों होंगी। हावड़ा जिले के दिल में स्थित यह सामान्य श्रेणी की सीट सात विधानसभा क्षेत्रों में से एक है जो हावड़ा लोकसभा सीट के दायरे में आती है।
हावड़ा मध्य का चुनावी नक्शा समय के साथ कई बार बदला है। साल 1951 से अब तक के इतिहास पर नजर डालें तो इस क्षेत्र का भूगोल कई बार पुनर्गठित किया गया है। शुरुआत में इस इलाके में हावड़ा उत्तर, पश्चिम, पूर्व और दक्षिण जैसे चार निर्वाचन क्षेत्र हुआ करते थे।
साल 1967 के चुनावों से ठीक पहले हावड़ा सेंट्रल के रूप में एक नई सीट बनाई गई, जिसे बाद में साल 2006 के परिसीमन आयोग के आदेश के बाद हावड़ा मध्य का नाम दिया गया। वर्तमान में यह निर्वाचन क्षेत्र हावड़ा नगर निगम के 18 वार्डों को अपने दायरे में समेटे हुए है। 1967 से 2006 के बीच के चुनावी परिणामों को देखें तो यहां कांग्रेस पार्टी का दबदबा रहा जिसने छह बार जीत हासिल की, जबकि रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी यानी आरएसपी ने तीन बार बाजी मारी।
साल 2011 के बाद से हावड़ा मध्य की राजनीति ने एक नया मोड़ लिया और यह पूरी तरह से तृणमूल कांग्रेस का अभेद्य किला बन गया। अरूप रॉय इस क्षेत्र के सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे जिन्होंने लगातार तीन बार जीत दर्ज की है। उन्होंने साल 2011 में माकपा के तत्कालीन विधायक को 50 हजार से अधिक वोटों के भारी अंतर से हराया था।
इसके बाद 2016 में उन्होंने जदयू उम्मीदवार को शिकस्त दी और 2021 के चुनावों में भाजपा के संजय सिंह को 46,547 वोटों के अंतर से हराकर अपनी लोकप्रियता सत की। साल 2021 के चुनाव में अरूप रॉय को कुल 1,11,554 वोट मिले थे, जो कुल मतदान का 57.2 प्रतिशत था। भाजपा साल 2014 के बाद से यहां मुख्य चुनौती के रूप में उभरी जरूर है, लेकिन वह अब तक तृणमूल के वर्चस्व को हिलाने में कामयाब नहीं हो पाई है।
हावड़ा मध्य की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह से एक शहरी सीट है और यहां ग्रामीण मतदाताओं की संख्या शून्य है। साल 2024 के आंकड़ों के अनुसार यहां कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2,69,095 तक पहुंच गई है। चुनावी समीकरणों की बात करें तो यहां मुस्लिम मतदाताओं की भागीदारी 24 प्रतिशत के करीब है, जो किसी भी उम्मीदवार की जीत या हार तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। वहीं अनुसूचित जाति के मतदाता केवल 2.27 प्रतिशत हैं।
शहरी क्षेत्र होने के बावजूद यहां मतदान का प्रतिशत काफी संतुलित रहा है। साल 2021 में यहां 73.26 प्रतिशत मतदान हुआ था, हालांकि 2024 के संसदीय चुनावों के दौरान इसमें मामूली गिरावट देखी गई और यह 70.40 प्रतिशत पर सिमट गया। किसी भी विपक्षी दल के लिए इस सीट पर जीत हासिल करना तब तक बेहद कठिन है जब तक कि वे तृणमूल के इस मजबूत वोट बैंक में सेंध न लगा लें।
इस विधानसभा क्षेत्र की पहचान इसके व्यस्त बाजारों और ऐतिहासिक स्थलों से है। हावड़ा मैदान, शरद सदन सभागार, गोलबाड़ी और पिलखाना जैसे इलाके इस क्षेत्र की धड़कन माने जाते हैं। व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र होने के कारण यहां छोटे विनिर्माण, खुदरा व्यापार और सेवा क्षेत्र का बड़ा जाल फैला हुआ है। हावड़ा रेलवे स्टेशन, जो भारत के सबसे महत्वपूर्ण रेल टर्मिनलों में से एक है, यहां से महज कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
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हावड़ा ब्रिज पार करते ही कोलकाता के मुख्य व्यापारिक केंद्र शुरू हो जाते हैं, जो इस क्षेत्र को भौगोलिक और आर्थिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाते हैं। अब 2026 की जंग में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा और वाम-कांग्रेस गठबंधन मिलकर तृणमूल को कोई कड़ी टक्कर दे पाएंगे या ममता बनर्जी का यह मजबूत किला एक बार फिर उनके पास ही रहेगा।