दमदम की बिसात पर ‘मंत्री जी’ का दांव, क्या इस बार बीजेपी पलट देगी 15 साल का इतिहास?
Dum Dum Seat Profile: बंगाल के दमदम में चुनावी पारा चढ़ा है, जहां टीएमसी के ब्रत्य बसु अपनी बादशाहत बचाने उतरे हैं, वहीं बीजेपी और लेफ्ट इस अभेद्य दुर्ग को ढहाने की फिराक में हैं।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
फोटो- नवभारत
West Bengal Assembly Elections 2026: कोलकाता के उत्तरी छोर पर स्थित दमदम का नाम सुनते ही जेहन में सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की हलचल और ऐतिहासिक एम्युनिशन फैक्ट्री की यादें ताजा हो जाती हैं। लेकिन आज इस शहरी शोर के पीछे एक अलग ही राजनीतिक सुगबुगाहट है।
दमदम केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह पश्चिम बंगाल की उस शहरी राजनीति का आईना है, जहां मतदाता बहुत सोच-समझकर अपना फैसला सुनाते हैं। 29 अप्रैल 2026 को जब यहां के लोग पोलिंग बूथ की ओर बढ़ेंगे, तो उनके मन में केवल विकास के वादे नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और पहचान से जुड़े कई सवाल भी होंगे।
वामपंथियों के पुराने गढ़ में ब्रत्य बसु की अजेय पारी
दमदम का इतिहास गवाह है कि यहां की जनता ने हमेशा मजबूती के साथ किसी एक विचारधारा का हाथ थामा है। एक दौर था जब यह इलाका कम्युनिस्ट पार्टी का ‘लाल किला’ माना जाता था, जहां वामपंथियों ने नौ बार जीत का परचम लहराया। लेकिन 2011 में जब बंगाल में सत्ता परिवर्तन की लहर चली, तो प्रसिद्ध अभिनेता और ममता सरकार में मंत्री ब्रत्य बसु ने यहां से टीएमसी का खाता खोला और तब से वे लगातार तीन बार यहां अजेय रहे हैं।
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बसु की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 2021 में बीजेपी के विमल शंकर नंदा को 26,731 वोटों के भारी अंतर से हराया था। हालांकि, बदलते वक्त के साथ जीत का यह फासला कभी घटता तो कभी बढ़ता रहा है, जो यह संकेत देता है कि मतदाता हर बार नई कसौटी पर अपने प्रतिनिधि को परख रहे हैं।
बीजेपी की बढ़ती ताकत और विपक्ष की नई घेराबंदी
पिछले कुछ सालों में दमदम की राजनीतिक तस्वीर में एक बड़ा बदलाव आया है। कभी यहां मुख्य लड़ाई टीएमसी और लेफ्ट के बीच होती थी, लेकिन अब बीजेपी ने मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में खुद को मजबूती से खड़ा कर लिया है। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान यहां कांटे की टक्कर देखी गई थी, जहां टीएमसी की बढ़त महज 5,112 वोटों तक सिमट गई थी।
हालांकि 2024 में यह बढ़त फिर से थोड़ी सुधरी, लेकिन बीजेपी का बढ़ता ग्राफ टीएमसी के लिए चिंता का विषय जरूर है। इस बार के दंगल में यदि लेफ्ट और कांग्रेस का गठबंधन दोबारा अपनी ताकत जुटाने में कामयाब रहता है, तो चुनावी गणित पूरी तरह उलझ सकता है। दमदम के शहरी मतदाता, जिनमें अनुसूचित जाति (SC) की आबादी करीब 12.72 प्रतिशत है, किसी भी दल की किस्मत बनाने या बिगाड़ने की ताकत रखते हैं।
शहरी बुनियादी ढांचे और वोटर लिस्ट का बड़ा पेच
एक विशुद्ध शहरी क्षेत्र होने के कारण यहां की समस्याएं भी उतनी ही जटिल हैं। बंटवारे के बाद शरणार्थियों के आगमन से लेकर आज के आधुनिक मेट्रो और इंफ्रास्ट्रक्चर तक, दमदम ने बहुत कुछ बदलते देखा है। लेकिन इस बार के चुनाव में जो एक बात सबसे ज्यादा चर्चा में है, वह है ‘वोटर लिस्ट’ को लेकर उपजी चिंता।
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राज्य भर में करीब 90 लाख नामों के लिस्ट से बाहर होने की खबरों ने यहां के लोगों में एक ‘ब्यूरोक्रेटिक तनाव’ पैदा कर दिया है। मतदाता इस बात को लेकर संशय में हैं कि कहीं प्रशासनिक फेरबदल की वजह से उनका लोकतांत्रिक अधिकार उनसे छिन न जाए। इसके साथ ही, बढ़ती महंगाई और रोजगार जैसे मुद्दे भी यहां के मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए उतने ही अहम हैं जितना कि हवाई अड्डे से जुड़ी व्यापारिक गतिविधियां।
