दिल्ली में बड़ा हादसा, हुमायूं के मकबरे का एक हिस्सा गिरा; मलबे में दबने से 6 लोगों की मौत
Humayun's Tomb: दिल्ली फायर सर्विस के एक अधिकारी ने बताया कि उन्हें शाम करीब 4:30 बजे घटना की सूचना मिली, जिसके बाद तुरंत फायर टेंडर की गाड़ियां मौके पर पहुंचीं। फिलहाल रेस्क्यू जारी है।
- Written By: मनोज आर्या
Delhi Humayun’s Tomb Accident: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से एक बुरी खबर सामने आ रही है। दरअसल, निजामुद्दीन स्थित हुमायूं के मकबरे में अचानक एक बड़ा हादसा हो गया। परिसर के अंदर बने कमरे की दीवार का एक हिस्सा भर-भराकर गिर गया। मिली जानकारी के अनुसार, इस हादसे के बाद मलबे में दबने से छह लोगों की मौत हो गई, जबकि कई लोग घायल हो गए हैं।
दिल्ली फायर सर्विस के एक अधिकारी ने बताया कि उन्हें शाम करीब 4:30 बजे घटना की सूचना मिली, जिसके बाद तुरंत फायर टेंडर की गाड़ियां मौके पर पहुंचीं। राहत और बचाव कार्य जारी है। फिलहाल फंसे लोगों को बाहर निकालने के प्रयास किए जा रहे है। यह ऐतिहासिक स्मारक 16वीं सदी के मध्य में निर्माण हुआ एक मकबरा है, जो दिल्ली में आने वाले पर्यटकों के बीच काफी मशहूर है।
हुमायूं ने 1533 में रखी थी नींव
बता दें कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्थित हुमायूं का मकबरा को ‘मकबरा-ए-हुमायूं’ भी कहते हैं, मुगल सम्राट हुमायूं की याद में बनाया गया एक भव्य स्मारक है। इसे उनकी पहली पत्नी बेगा बेगम, जिन्हें हाजी बेगम के नाम से भी जाना जाता है, ने 1569-70 में बनवाया था। इस शानदार मकबरे का डिज़ाइन फ़ारसी वास्तुकार मिर्क मिर्ज़ा गियास और उनके बेटे सय्यद मुहम्मद ने तैयार किया था। यह मकबरा भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी तरह का पहला बगीचा-मकबरा है, जो दिल्ली के निज़ामुद्दीन पूर्व इलाके में स्थित है। इसके नज़दीक ही पुराना किला, जिसे दीना-पनाह के नाम से भी जाना जाता है, मौजूद है। इस किले की नींव खुद हुमायूं ने 1533 में रखी थी।
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हुमायूं का मकबरा लाल बलुआ पत्थर का इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने वाली पहली इमारत भी है, जो इसे और भी खास बनाता है। साल 1993 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया, जिसके बाद यहां बड़े पैमाने पर संरक्षण और जीर्णोद्धार का काम किया गया। मुख्य मकबरे के साथ-साथ इस परिसर में कई छोटे-छोटे स्मारक भी हैं।
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मुगल वास्तुकला का एक शानदार नमूना है यह मकबरा
खास तौर पर, पश्चिमी प्रवेश द्वार के पास ईसा खान नियाज़ी का मकबरा परिसर है। ईसा खान, सूरी वंश के शेरशाह सूरी के दरबार में एक प्रमुख अफगान सरदार थे, जिन्होंने 1547 में मुगलों के खिलाफ युद्ध लड़ा था। यह मकबरा न केवल ऐतिहासिक महत्व रखता है, बल्कि मुगल वास्तुकला का एक शानदार नमूना भी है, जो इतिहास और कला के प्रेमियों को आज भी आकर्षित करता है।
