टीवी की तुलसी से छत्तीसगढ़ भाजपा के महतारी संवाद तक, स्मृति ईरानी की नई राजनीतिक परीक्षा

Smriti Irani Chhattisgarh : स्मृति ईरानी की छत्तीसगढ़ भाजपा प्रभारी के रूप में नियुक्ति संगठन, महिला मतदाताओं और आगामी राजनीति के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है।
Smriti Irani balances party governance and female voter engagement.
स्मृति ईरानीPhoto Credit: BJP Official / X
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Smriti Irani political career : टेलीविजन के पर्दे पर स्मृति ईरानी ने कभी तुलसी बनकर एक बड़े परिवार की बहू की भूमिका निभाई थी। अब राजनीति ने उन्हें एक और बड़े परिवार की जिम्मेदारी दी है और वह है छत्तीसगढ़ भाजपा। फर्क इतना है कि इस बार कहानी लिखी नहीं जाएगी, बल्कि संगठन के भीतर रिश्ते बनाने होंगे।

भाजपा ने 23 सितंबर को स्मृति ईरानी को छत्तीसगढ़ का प्रदेश प्रभारी नियुक्त किया है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की ओर से की गई संगठनात्मक नियुक्तियों में ईरानी को छत्तीसगढ़ के साथ हरियाणा का भी प्रभार मिला है। यह फेरबदल 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रभारियों और सह-प्रभारियों की नियुक्ति के तहत हुआ है।

सास की भूमिका होगी या बहू का रिश्ता

यह सवाल किसी पारिवारिक रिश्ते का नहीं, भाजपा संगठन के भीतर उनकी कार्यशैली का रूपक है। सास यानी दिल्ली से मिले निर्देशों को प्रदेश संगठन तक पहुंचाने वाली, सरकार और संगठन की निगरानी करने वाली और जरूरत पड़ने पर कड़े फैसले लेने वाली प्रभारी। वहीं बहू यानी प्रदेश के पुराने नेताओं, विधायकों, कार्यकर्ताओं और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच जाकर स्थानीय राजनीति को समझने और रिश्ते बनाने वाली नेता। स्मृति के सामने दोनों भूमिकाओं का संतुलन बड़ी चुनौती होगी।

तुलसी की वापसी और राजनीति का नया अध्याय

इस नियुक्ति का संयोग इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि स्मृति ईरानी की तुलसी वाली पहचान अभी भी सार्वजनिक स्मृति में मौजूद है। क्योंकि सास भी कभी बहू थी के दूसरे सीजन में वह तुलसी के किरदार में फिर टेलीविजन पर लौटी हैं। 2024 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद उन्होंने खुद बताया कि उन्होंने काम के लिए मनोरंजन जगत में दोबारा संपर्क किया और बाद में शो में वापसी की।

हालांकि राजनीति में स्मृति की कहानी तुलसी से बहुत आगे निकल चुकी है। टीवी अभिनेत्री से भाजपा संगठन तक पहुंचने के बाद वह राज्यसभा सांसद बनीं, केंद्र में मंत्री रहीं और 2019 में अमेठी से राहुल गांधी को हराकर लोकसभा पहुंचीं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय समेत महत्वपूर्ण मंत्रालय संभालने के बाद 2024 में अमेठी से चुनाव हारने के बावजूद वह भाजपा संगठन में सक्रिय रहीं। अब उन्हें राज्य प्रभारी की जिम्मेदारी मिली है। यानी छत्तीसगढ़ उनके लिए वापसी नहीं, बल्कि राजनीति के एक अलग मैदान में नई भूमिका है।

छत्तीसगढ़ में बहू वाली भूमिका क्यों महत्वपूर्ण

छत्तीसगढ़ भाजपा आज सत्ता में है। ऐसे में प्रदेश प्रभारी की चुनौती अलग है। सरकार और संगठन के बीच तालमेल, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय और सरकार की योजनाओं का राजनीतिक फीडबैक ये सभी उनकी जिम्मेदारी के हिस्से होंगे और यहां बहू वाली भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। छत्तीसगढ़ की राजनीति सिर्फ रायपुर तक सीमित नहीं है। सरगुजा से बस्तर और मैदानी इलाकों से लेकर आदिवासी क्षेत्रों तक राजनीतिक मुद्दे और संगठन की जरूरतें अलग-अलग हैं। बाहर से आया कोई भी प्रभारी तभी प्रभावी हो सकता है, जब वह स्थानीय नेतृत्व को सिर्फ निर्देश देने के बजाय उसकी बात भी सुने।

महिला वोट...तुलसी से महतारी तक

स्मृति की नियुक्ति का दूसरा बड़ा पहलू महिला मतदाता हैं। 2023 के विधानसभा चुनाव में महिला मतदाताओं की भागीदारी छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण रही। इसी चुनाव में भाजपा ने महतारी वंदन योजना का वादा किया था, जिसमें विवाहित महिलाओं को सालाना आर्थिक सहायता देने की बात थी। चुनावी विश्लेषणों में इस योजना को भाजपा के महिला-केंद्रित अभियान के महत्वपूर्ण हिस्सों में गिना गया। इसलिए स्मृति की भूमिका केवल संगठन तक सीमित नहीं रहेगी। उनके सामने यह सवाल भी होगा कि महिला लाभार्थियों तक पहुंच को राजनीतिक और सामाजिक जुड़ाव में कैसे बदला जाए। यहीं तुलसी से महतारी तक की कहानी बनती है। जिस स्मृति ईरानी को कभी देश के घरों में एक बहू के किरदार के रूप में पहचाना गया, वही अब ऐसे राज्य में भाजपा संगठन की जिम्मेदारी संभाल रही हैं जहां महिला मतदाता चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

असली परीक्षा रिश्तों की होगी

छत्तीसगढ़ भाजपा के भीतर स्मृति के लिए सबसे बड़ी परीक्षा शायद कोई बड़ा भाषण या बड़ी चुनावी रणनीति नहीं होगी। परीक्षा होगी रिश्तों की। क्या वह प्रदेश के नेताओं को दिल्ली का संदेश सुनाने वाली प्रभारी बनेंगी? या पहले छत्तीसगढ़ की आवाज सुनेंगी और फिर उसे दिल्ली तक पहुंचाएंगी? सास वाली भूमिका में अधिकार ज्यादा होगा, लेकिन बहू वाली भूमिका में स्वीकार्यता बनाने का रास्ता ज्यादा खुला होगा।

भाजपा जैसे कैडर आधारित संगठन में दोनों की जरूरत है। बहुत ज्यादा सास बनीं तो स्थानीय नेतृत्व के साथ दूरी का खतरा होगा, और बहुत ज्यादा बहू बनीं तो केंद्रीय संगठन की अपेक्षाओं को लागू करने में कठिनाई आ सकती है। इसलिए स्मृति ईरानी के लिए असली चुनौती सास और बहू में से किसी एक को चुनना नहीं, बल्कि दोनों भूमिकाओं के बीच संतुलन बनाना होगी। टीवी पर तुलसी को परिवार संभालना था। अब स्मृति को भाजपा का छत्तीसगढ़ परिवार संभालना है। फर्क सिर्फ इतना है कि सीरियल में रिश्ते संवाद से बनते थे, राजनीति में रिश्ते संवाद के साथ संगठन, सत्ता और चुनावी गणित से बनते हैं।

5 बड़े मायने

1. ‘तुलसी’ की पहचान का राजनीतिक इस्तेमाल

स्मृति ईरानी की सबसे अलग पहचान यह है कि राजनीति में आने से पहले वह क्योंकि सास भी कभी बहू थी की ‘तुलसी’ के रूप में घर-घर पहचानी जाती थीं। ऐसे समय में जब वह फिर ‘तुलसी’ के किरदार में टीवी पर लौटी हैं, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की जिम्मेदारी मिलना उनकी पुरानी लोकप्रिय पहचान और मौजूदा राजनीतिक भूमिका को एक साथ जोड़ता है।

2. महिला वोट पर फोकस का संकेत

छत्तीसगढ़ में महिला मतदाता चुनावी राजनीति की महत्वपूर्ण ताकत हैं। 2023 में महिलाओं की मतदान भागीदारी कई सीटों पर पुरुषों से अधिक रही। ऐसे में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय संभाल चुकी स्मृति ईरानी की नियुक्ति को भाजपा के महिला-केंद्रित राजनीतिक संवाद के संदर्भ में भी देखा जा सकता है।

3. ‘महतारी वंदन’ के आगे की राजनीति

भाजपा की 2023 की जीत में महिलाओं के लिए ‘महतारी वंदन योजना’ एक प्रमुख चुनावी मुद्दा रही। अब चुनौती योजना के लाभ को सिर्फ आर्थिक सहायता तक सीमित रखने के बजाय महिला मतदाताओं के साथ लंबे राजनीतिक संवाद में बदलने की है। ईरानी की भूमिका इस मोर्चे पर महत्वपूर्ण हो सकती है।

4. सरकार से ज्यादा संगठन पर नजर

प्रभारी का काम सिर्फ सरकार की योजनाओं का प्रचार करना नहीं होता। प्रदेश संगठन की समीक्षा, कार्यकर्ताओं से संवाद, गुटों के बीच समन्वय और जमीनी फीडबैक तक पहुंचना उनकी बड़ी जिम्मेदारी होगी। यानी ईरानी की असली परीक्षा मंच पर भाषणों से ज्यादा संगठन के भीतर होगी।

5. 2028 की तैयारी का शुरुआती संकेत

अगला विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन प्रभारी की नियुक्ति को संगठन की दीर्घकालिक तैयारी के संदर्भ में देखा जा सकता है। 2023 की जीत और 2024 के लोकसभा प्रदर्शन के बाद भाजपा के सामने उस राजनीतिक आधार को बनाए रखने की चुनौती है। ईरानी की नियुक्ति इस तैयारी में महिला वोट, संगठन और सरकार के कामकाज—तीनों के बीच तालमेल बनाने की दिशा में देखी जा सकती है।

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