राजिम का रहस्यमयी इतिहास: 3 नदियों का संगम और पैरी तट पर 2500 साल पुराना बंदरगाह

Rajiv Lochan Temple Rajim : छत्तीसगढ़ के राजिम में त्रिवेणी संगम पर स्थित हरि-हर की नगरी, राजीव लोचन मंदिर, तेलिन माता की कथा, सीताबाड़ी के अवशेष और प्राचीन बंदरगाह ऐतिहासिक धरोहर हैं।
Rajiv Lochan Temple (Lord Vishnu)
राजीव लोचन मंदिर भगवान विष्णु सोर्स - नवभारत लाइव
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Highlights

  • त्रिवेणी संगम पर बसी राजिम की अनोखी दास्तान।

  • जानिए राजिम के हरि-हर बनने का पूरा सच।

  • राजिम में छिपा है 2500 साल पुराना राज।

  • सीताबाड़ी और प्राचीन बंदरगाह की हैरान करने वाली कहानी।

  • छत्तीसगढ़ का प्रयाग राजिम क्यों है बेहद खास?

Chhattisgarh Rajim Triveni Sangam : महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के त्रिवेणी संगम पर बसा राजिम छत्तीसगढ़ की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है। भगवान विष्णु के राजीव लोचन मंदिर और संगम के बीच स्थित कुलेश्वर महादेव के कारण इसे हरि-हर की नगरी कहा जाता है। राजिम की पहचान केवल मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। राजिम तेलिन माता की लोकगाथा, सीताबाड़ी के पुरातात्विक अवशेष और पैरी नदी के तट पर प्राचीन बंदरगाह के उल्लेख इस क्षेत्र के अतीत की अलग-अलग परतें सामने लाते हैं।

हरि-हर की नगरी में आस्था की परंपरा

राजीव लोचन मंदिर भगवान विष्णु की उपासना का प्राचीन केंद्र है। मंदिर की स्थापत्य कला और यहां मिले अभिलेख राजिम की ऐतिहासिक महत्ता को सामने लाते हैं। नलवंशी शासक विलासतुंग से संबंधित अभिलेख को लिपि के आधार पर लगभग 700 से 725 ईस्वी के बीच का माना जाता है। मंदिर परिसर में कलचुरी सामंत जगपालदेव का 1145 ईस्वी का अभिलेख भी मिला है।

दूसरी ओर, महानदी के संगम के बीच स्थित कुलेश्वर महादेव मंदिर शिवभक्ति का प्रमुख केंद्र है। विष्णु और शिव उपासना की यह साझा परंपरा राजिम को हरि-हर की नगरी के रूप में विशिष्ट पहचान देती है। संगम में स्नान, तर्पण, श्राद्ध और अस्थि विसर्जन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। माघ पूर्णिमा का मेला और राजिम कुंभ कल्प भी इस तीर्थ की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

Rajim Triveni Sangam
राजिम त्रिवेणी संगमसोर्स - नवभारत लाइव

राजिम तेलिन माता की लोकगाथा

राजिम की धार्मिक स्मृति में तेलिन माता का भी विशेष स्थान है। राजीव लोचन मंदिर परिसर में स्थित उनका मंदिर स्थानीय लोकआस्था से जुड़ा है। प्रचलित कथा में एक तेल बेचने वाली महिला की भक्ति, भगवान विष्णु की प्रतिमा और राजा से जुड़ा प्रसंग सुनाया जाता है। लोकमान्यता के अनुसार, इस कथा का संबंध राजिम और राजीव लोचन नाम की परंपरा से भी जोड़ा जाता है।

यह लोकगाथा एक साधारण महिला की भक्ति और उसके सम्मान को धार्मिक स्मृति में स्थान देती है। कथा के अलग-अलग रूप प्रचलित हैं, इसलिए इसे प्रमाणित अभिलेखीय इतिहास के बजाय स्थानीय धार्मिक परंपरा के रूप में देखना उचित है। तेलिन माता का मंदिर आज भी राजिम की विशिष्ट लोकआस्था का प्रतीक है।

चित्रोत्पला से महानदी तक

महानदी को प्राचीन धार्मिक और क्षेत्रीय परंपराओं में चित्रोत्पला तथा चित्रोत्पला गंगा जैसे नामों से जोड़ा गया है। नीलोत्पला नाम का उल्लेख भी मिलता है। महानंदा, महाश्वेता और कनकनंदिनी जैसे नाम भी कुछ धार्मिक विवरणों में आते हैं। इन नामों के साथ पौराणिक प्रसंग और युगों से जुड़ी मान्यताएं प्रचलित हैं।

महानदी और उसकी सहायक नदियों ने इस क्षेत्र की कृषि, बस्तियों और सांस्कृतिक जीवन को आधार दिया। पैरी और सोंढूर नदियों का महानदी नदी तंत्र से जुड़ाव इस पूरे भूभाग को प्राकृतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाता है।

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राजिम त्रिवेणी संगमसोर्स - नवभारत लाइव

सीताबाड़ी में प्राचीन बसाहट के साक्ष्य

राजीव लोचन मंदिर परिसर के निकट स्थित सीताबाड़ी राजिम का महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। यहां उत्खनन में पत्थर और ईंटों से बनी संरचनाएं तथा प्राचीन बसाहट से जुड़े अवशेष सामने आए हैं। प्रकाशित पुरातात्विक विवरणों में इन अवशेषों को अलग-अलग ऐतिहासिक कालखंडों से जोड़ा गया है।

यह स्थल राजिम के इतिहास को मंदिरों की परंपरा से आगे ले जाकर यहां की पुरानी बसाहट और मानवीय गतिविधियों को समझने का अवसर देता है। सीताबाड़ी के अवशेषों का अध्ययन राजीव लोचन मंदिर के अभिलेखों और आसपास के नदी क्षेत्र से जुड़े पुरातात्विक संदर्भों के साथ किया जाए तो राजिम के लंबे सांस्कृतिक विकास की बेहतर तस्वीर सामने आ सकती है।

पैरी नदी के तट पर प्राचीन बंदरगाह

गरियाबंद जिले में पांडुका के पास पैरी नदी के तट पर स्थित सिरकट्टी क्षेत्र में प्राचीन बंदरगाह के अवशेषों का उल्लेख मिलता है। प्रकाशित विवरणों के अनुसार, यहां चट्टानों को काटकर नावों के ठहरने के लिए गोदी जैसी संरचनाएं बनाई गई थीं। इस स्थल को लगभग ढाई हजार वर्ष पुराने बंदरगाह से जोड़कर देखा जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद की प्रश्न-बैंक सामग्री में भी पांडुका के पास प्राचीन बंदरगाह के अवशेषों का उल्लेख है।

ये विवरण इस संभावना की ओर संकेत करते हैं कि पैरी नदी का उपयोग प्राचीन काल में जल परिवहन और वस्तुओं की आवाजाही के लिए होता रहा होगा। पैरी और सोंढूर का महानदी नदी तंत्र से जुड़ाव इस क्षेत्र की भौगोलिक उपयोगिता को भी रेखांकित करता है। हालांकि, यहां से चीन तक सीधे व्यापार होने या कोसा के निर्यात जैसे दावों के लिए स्वतंत्र पुरातात्विक प्रमाण आवश्यक हैं।

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Rajim Triveni Sangam
राजिम त्रिवेणी संगमसोर्स - सोशल मीडिया

जैन-बौद्ध परंपराओं के संदर्भ

राजिम और आसपास के क्षेत्र के इतिहास को समझने में जैन और बौद्ध परंपराओं से जुड़े संदर्भों का अध्ययन भी महत्वपूर्ण है। पुराने सर्वेक्षणों और क्षेत्रीय पुरातात्विक विवरणों में विभिन्न धार्मिक प्रभावों की चर्चा मिलती है। हालांकि, किसी विशेष स्थल या अवशेष को निश्चित जैन अथवा बौद्ध पहचान और काल से जोड़ने के लिए प्रमाणित पुरातात्विक साक्ष्य जरूरी हैं। इन संदर्भों का व्यवस्थित अध्ययन राजिम की सांस्कृतिक विरासत को और व्यापक रूप से समझने में मदद कर सकता है।

आस्था, इतिहास और संरक्षण

राजिम की पहचान तीन नदियों के संगम, हरि-हर की उपासना, तेलिन माता की लोकगाथा, सीताबाड़ी के पुरातात्विक अवशेष और पैरी नदी के प्राचीन बंदरगाह के उल्लेख से मिलकर बनती है। यहां धार्मिक आस्था आज भी जीवंत है, जबकि पुरातात्विक स्थल अतीत को समझने के अवसर देते हैं।

नदियों, घाटों, मंदिरों और पुरातात्विक स्थलों का संरक्षण तथा प्रमाण आधारित अध्ययन जरूरी है। राजिम केवल तीन नदियों का संगम नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की धार्मिक स्मृति, लोकपरंपरा और ऐतिहासिक विरासत का ऐसा केंद्र है, जहां आस्था के साथ अतीत की अनेक परतें आज भी मौजूद हैं।

Story by Vinod Jain

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