

दशहरे के पारंपरिक आयोजन का बजट बिगाड़ा।
रायपुर के बाजारों में सज चुका है रावण का पुतला।
करीब 15 से 20 फीसदी तक बढ़ गए हैं दाम।
कीमतों में बढ़ोतरी ने कारीगरों की लागत बढ़ा दी।
Raipur Ravana Dahan Budget: दशहरा आते ही शहर में रावण दहन की तैयारियां तेज हो गई हैं। मैदान सजने लगे हैं। आयोजक पुतलों का ऑर्डर देने में जुटे हैं और कारीगर रावण, कुंभकर्ण व मेघनाद को आकार देने में लगे हैं। लेकिन इस बार बुराई के प्रतीक रावण को जलाने के लिए आयोजकों को अपनी जेब ज्यादा ढीली करनी पड़ेगी। वजह है महंगाई जिसने दशहरे के इस पारंपरिक आयोजन का बजट बिगाड़ दिया है। राजधानी में पुतले बनाने की लागत पिछले साल के मुकाबले करीब 15 से 20 फीसदी तक बढ़ गई है।
रावण का पुतला दूर से भले ही रंग-बिरंगा और आकर्षक दिखाई देता हो, लेकिन उसे तैयार करने में कई तरह की सामग्री और मेहनत लगती है। पुतले का ढांचा खड़ा करने के लिए बांस, उसे आकार देने के लिए कागज और कपड़ा, मजबूती के लिए तार-सुतली और अंतिम सजावट के लिए रंग-पेंट का इस्तेमाल किया जाता है। इस बार इन सामानों की कीमतों में बढ़ोतरी ने कारीगरों की लागत बढ़ा दी है।
कारीगरों के मुताबिक बांस जैसे बुनियादी सामान के महंगे होने का असर सीधे पुतले की कीमत पर पड़ रहा है। पिछले साल जिस आकार का पुतला तैयार करने में जितना खर्च आता था, उसी काम के लिए अब हजारों रुपये अतिरिक्त लगाने पड़ रहे हैं। महंगाई का असर सिर्फ बड़े आयोजनों तक सीमित नहीं है। छोटे पुतलों की कीमत भी बढ़ी है। वहीं, 100 फीट के विशाल रावण का निर्माण आयोजकों के लिए और महंगा सौदा साबित हो रहा है। आकार जितना बड़ा होता है, ढांचे से लेकर कपड़े, सजावट और निर्माण में लगने वाली मेहनत तक का खर्च उतना ही बढ़ जाता है।
रावण दहन का आकर्षण केवल पुतले तक सीमित नहीं रहता। आतिशबाजी भी आयोजन का अहम हिस्सा होती है। ऐसे में पुतला बनाने की बढ़ी लागत के साथ आतिशबाजी का खर्च भी समितियों के बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल रहा है। कारीगरों का कहना है कि पुतले की कीमत बढ़ने के बावजूद निर्माण में लगने वाली मेहनत कम नहीं हुई है। ऐसे में उनके सामने लागत और कमाई के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। दूसरी ओर, आयोजकों को भी तय बजट में दशहरे की परंपरा और आयोजन की भव्यता बनाए रखने की मशक्कत करनी पड़ रही है।
इस बार रावण दहन के दिन आतिशबाजी और उत्सव का नजारा तो देखने को मिलेगा लेकिन उसके पीछे की तैयारी महंगाई की मार से जूझ रही है।