

रावण दहन नहीं, अंतर्मन की बुराइयों को मिटाने का संदेश देती है सदियों पुरानी परंपरा।
राजमहल में पान-सुपारी भेंट के साथ हुआ समापन।
परंपराओं को सहेजने की जरूरत: मंत्री खुशवंत साहेब।
राजा निलेन्द्र बहादुर सिंह की निकली पारंपरिक विजय यात्रा।
Chhattisgarh Dussehra 2026: छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने वाला फिंगेश्वर का राजशाही दशहरा इस वर्ष भी पारंपरिक शाही अंदाज में मनाया गया। राजपरिवार की परंपराओं, धार्मिक अनुष्ठानों और पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों की झांकी के बीच निकली राजा की विजय यात्रा आयोजन का प्रमुख आकर्षण रही। बस्तर दशहरे के बाद प्रदेश में विशिष्ट पहचान रखने वाले इस आयोजन में आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। यहां दशहरे पर रावण दहन नहीं किया जाता, बल्कि मनुष्य को अपने भीतर की बुराइयों का अंत करने का संदेश दिया जाता है।
दशहरा उत्सव की शुरुआत सुबह मंदिरों और राजमहल में पूजा-अर्चना के साथ हुई। मौली मंदिर, बालाजी मंदिर, पंच मंदिर और फणीकेश्वरनाथ महादेव मंदिर सहित विभिन्न देवालयों में धार्मिक अनुष्ठान हुए। राजपरिवार ने भी परंपरा के अनुरूप पूजा-अर्चना की। दिनभर नगर में उत्सव का माहौल रहा। दशहरा देखने पहुंचे लोगों ने बाजारों में भ्रमण किया और राजपरिवार की ऐतिहासिक परंपरा को करीब से देखा।
राजशाही दशहरा महोत्सव में छत्तीसगढ़ शासन के कैबिनेट मंत्री गुरु खुशवंत साहेब और राजिम विधायक रोहित साहू शामिल हुए। छत्तीसगढ़ गौ सेवा आयोग के उपाध्यक्ष राजीव लोचन दास महाराज की भी उपस्थिति रही। आयोजन में क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और नगरवासियों ने भाग लिया। विधायक रोहित साहू ने राजशाही दशहरे को सांस्कृतिक विरासत, आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को सहेजना जरूरी है, ताकि नई पीढ़ी भी अपने इतिहास और संस्कृति से जुड़ी रहे।
रात्रि में राजशाही दशहरे का प्रमुख आकर्षण राजा निलेन्द्र बहादुर सिंह की पारंपरिक विजय यात्रा रही। राजा राजपरिवार के सदस्यों के साथ पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों की झांकी लेकर निकले। इस शाही यात्रा को देखने के लिए लोग उत्सुकता से इंतजार करते रहे। यात्रा के माध्यम से फिंगेश्वर की राजपरंपरा और ऐतिहासिक विरासत की झलक देखने को मिली।
विजय यात्रा के दौरान क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और नगरवासियों ने राजा से मुलाकात कर दशहरे की शुभकामनाएं दीं। यात्रा के बाद राजमहल में पारंपरिक रीति-रिवाज के अनुसार पान-सुपारी भेंट की गई। इसी के साथ राजशाही दशहरा महोत्सव का समापन हुआ।