NMDC सालाना खर्च कर रहा 25 करोड़ रुपए, फिर भी इलाज के लिए बाहर जा रहे बस्तर के मरीज

Better Health in Bastar: सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर और करोड़ों की सहायता के बावजूद कॉन्टिनेंटल अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल उठ रहा है। विधायक विनायक गोयल को इलाज के लिए हैदराबाद जाना पड़ा।
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कॉन्टिनेंटल सुपर स्पेशलिटी अस्पताल(सोर्स: सोशल मीडिया)
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Highlights

  • बस्तर में स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च।

  • मरीजों को दूसरे शहरों का रुख करना पड़ रहा है।

  • सरकार ने बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराया है।

  • रायपुर, हैदराबाद और विशाखापत्तनम पर निर्भरता कम होगी।

Chhattisgarh NMDC Spending Crores in Health: बस्तर में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद गंभीर मरीजों को इलाज के लिए दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ रहा है। डिमरापाल स्थित कॉन्टिनेंटल सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, जिसे NMDC से सालाना 25 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता मिलती है और जिसके लिए सरकार ने बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराया है, अब अपनी उपयोगिता को लेकर सवालों के घेरे में है।

हाल ही में चित्रकोट विधायक विनायक गोयल की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें कॉन्टिनेंटल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन बाद में बेहतर उपचार के लिए हैदराबाद ले जाने का निर्णय किया गया। इस घटनाक्रम ने सवाल खड़ा कर दिया है कि जब जनप्रतिनिधियों को भी उपचार के लिए दूसरे शहरों का रुख करना पड़ रहा है, तो गंभीर बीमारी से जूझ रहे आम मरीजों को स्थानीय स्तर पर कितनी राहत मिल रही होगी?

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करोड़ों की सहायता, जवाबदेही किसकी?

बस्तर को उम्मीद थी कि सुपर स्पेशलिटी अस्पताल शुरू होने से गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए रायपुर, हैदराबाद और विशाखापत्तनम पर निर्भरता कम होगी। लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों, गंभीर बीमारियों के उपचार और आपातकालीन सेवाओं की उपलब्धता को लेकर सवाल बने हुए हैं। अस्पताल में इलाज के खर्च और सुविधाओं को लेकर उठने वाली शिकायतें भी जांच और स्पष्ट जवाब की मांग करती हैं।

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बस्तर के मरीजों को कितना मिल रहा है?

अब सवाल है कि NMDC से मिलने वाली 25 करोड़ रुपए की सालाना सहायता का उपयोग किस तरह हो रहा है और इसका लाभ बस्तर के मरीजों को कितना मिल रहा है? अस्पताल प्रबंधन, जिला प्रशासन और राज्य सरकार को उपलब्ध सुविधाओं, उपचार क्षमता और मरीजों को रेफर करने की स्थिति पर जवाब देना चाहिए।

बस्तर की जनता को केवल अस्पताल की इमारत और सुपर स्पेशलिटी का नाम नहीं, बल्कि समय पर बेहतर इलाज चाहिए। करोड़ों रुपये की सहायता और सरकारी संसाधनों के बाद भी यदि मरीजों को बाहर जाना पड़े, तो इस व्यवस्था की समीक्षा और जवाबदेही तय करना जरूरी है।

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