

सरगीपाल में निभाई गई सदियों पुरानी परंपरा
युग्म बेल को दंतेश्वरी मंदिर लाकर किया गया स्थापित
स्तर की आराध्य देवी की पूजा परंपरा।
600 साल पुरानी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध बस्तर दशहरा
Unique Tradition in Bastar Dussehra: बस्तर दशहरा सिर्फ रथ, रस्मों और देवी-देवताओं की आराधना का पर्व नहीं है, बल्कि यह ऐसी अनूठी परंपराओं का संसार है, जिनके पीछे आस्था, लोकविश्वास और इतिहास की गहरी परतें छिपी हैं। इन्हीं परंपराओं में एक है ‘बेल पूजा’, जिसमें एक प्राचीन वृक्ष पर प्राकृतिक रूप से जोड़े में लगे बेल फलों को शिव और शक्ति का प्रतीक मानकर विशेष अनुष्ठान किया जाता है। सवाल यह है कि आखिर इन दो बेल फलों को इतना पवित्र क्यों माना जाता है और इन्हें बस्तर दशहरा की परंपरा में इतना महत्वपूर्ण स्थान कैसे मिला?
रविवार को जगदलपुर के समीप ग्राम सरगीपाल में इसी परंपरा का विधि-विधान से निर्वहन किया गया। प्राचीन बेल वृक्ष के नीचे ग्रामीणों और श्रद्धालुओं की मौजूदगी में पूजा-अर्चना हुई। अनुष्ठान के बाद युग्म बेल को पारंपरिक गाजे-बाजे और वाद्ययंत्रों के साथ शोभायात्रा में जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर लाया गया, जहां उसे विधिपूर्वक स्थापित किया गया। इस तरह प्रकृति की गोद में मिले एक प्रतीक को बस्तर की आराध्य देवी की पूजा परंपरा से जोड़ने की सदियों पुरानी मान्यता फिर जीवंत हुई।
बेल पूजा से जुड़ी लोककथा इस परंपरा को और भी रोचक बनाती है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, बस्तर के तत्कालीन राजा शिकार के लिए सरगीपाल के जंगल पहुंचे थे। वहां बेल वृक्ष के नीचे उन्हें दो सुंदर कन्याएं दिखाई दीं। राजा ने उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा, तो कन्याओं ने उन्हें बारात लेकर आने को कहा। अगले दिन राजा बारात लेकर पहुंचे, तब मान्यता के अनुसार दोनों कन्याओं ने स्वयं को उनकी आराध्य देवियों-मां दंतेश्वरी और मां माणिकेश्वरी-के रूप में प्रकट किया। इसी लोकमान्यता को बेल पूजा की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
सरगीपाल में बेल पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहती। यहां का वातावरण विवाह समारोह जैसा हो जाता है। पूजा से एक दिन पहले युग्म बेल को निमंत्रण देने और लाल वस्त्र अर्पित करने की रस्म निभाई जाती है। पूजा के दिन ग्रामीण महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं और हल्दी लगाकर मांगलिक उत्सव मनाती हैं। इसके बाद पूरे सम्मान के साथ युग्म बेल को वृक्ष से उतारकर शोभायात्रा के जरिए मां दंतेश्वरी मंदिर पहुंचाया जाता है। इस अवसर पर बस्तर राजपरिवार के सदस्य एवं माटी पुजारी कमलचंद भंजदेव और बस्तर सांसद व बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप मौजूद रहे।
करीब 600 साल पुरानी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध बस्तर दशहरा देश के दूसरे दशहरा पर्वों से अलग है। यहां उत्सव का केंद्र रावण दहन नहीं, बल्कि मां दंतेश्वरी की आराधना, स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराएं और आदिवासी संस्कृति है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में बेल पूजा जैसी रस्में बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को विशिष्ट बनाती हैं।
सरगीपाल का युग्म बेल इसी जीवंत विरासत का प्रतीक है, जहां एक प्राकृतिक दृश्य लोकविश्वास, राजपरंपरा और सामुदायिक उत्सव से जुड़ जाता है। यही वजह है कि बेल पूजा बस्तर दशहरा की उन परंपराओं में शामिल है, जिनकी कहानी जानने के बाद इस पर्व की विशिष्टता और गहराई का अहसास होता है।