(प्रतीकात्मक तस्वीर)
Egg Price Drop In India: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के की वजह से गल्फ के बड़े मार्केट में एक्सपोर्ट में रुकावट आने से भारत में अंडों की कीमतों में भारी गिरावट आई है। बेंगलुरु में होलसेल अंडों की कीमतें लगभग 7 रुपये प्रति अंडे से घटकर 5 रुपये हो गई हैं। थोक खरीदार अब लगभग 500 रुपये में 100 अंडे ले सकते हैं। बिजनेस टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, रिटेल कीमतें भी गिर गई हैं, अब अंडे 5.50 से 6 रुपये प्रति पीस बिक रहे हैं, जबकि पहले इनकी कीमत 8 से 9 रुपये थी।
सुरक्षा चिंताओं और ट्रांसपोर्ट रूट में रुकावट की वजह से UAE, ओमान, कतर और बहरीन जैसे देशों के साथ व्यापार रुक गया है। इस वजह से हुए सरप्लस से घरेलू अंडों की कीमतों में अचानक गिरावट आई है, जिससे कंज्यूमर्स को राहत मिली है, लेकिन पोल्ट्री किसानों के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं, जो इन एक्सपोर्ट पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं।
इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक, संकट बढ़ने से पहले भारत से गल्फ में रोजाना लगभग एक करोड़ अंडे एक्सपोर्ट किए जाते थे। जैसे-जैसे हालात बिगड़े, एक्सपोर्ट के लिए रखे गए अंडों को घरेलू मार्केट में भेज दिया गया, जिससे ओवरसप्लाई हो गई। इंडस्ट्री के सूत्रों का कहना है कि भारत में बनने वाले लगभग 80% अंडे आम तौर पर खाड़ी देशों को एक्सपोर्ट किए जाते हैं।
रमजान के दौरान खाने की चीजों की खपत में बदलाव से ट्रांसपोर्टेशन और एक्सपोर्ट लॉजिस्टिक्स में रुकावट और बढ़ गई है, जिससे खाड़ी देशों से डिमांड और कम हो गई है। एक्सपोर्ट रुकने से, भारतीय बाज़ार अब इस ज़्यादा स्टॉक को सोख रहा है, जिससे होलसेल और रिटेल दोनों सेगमेंट में कीमतें कम हो गई हैं।
इस गिरावट की वजह से कंज्यूमर्स की डिमांड बढ़ गई है, जिनमें से कई ने कीमतें ज्यादा होने पर अंडे खाना कम कर दिया था। ज्यदा सस्ते रेट का मतलब है कि अंडे देश भर के परिवारों के लिए प्रोटीन का पसंदीदा और आसानी से मिलने वाला सोर्स बन रहे हैं। अंडे अपने न्यूट्रिशनल कंटेंट के लिए जाने जाते हैं, जो विटामिन A, D, E, B12, साथ ही आयरन और सेलेनियम देते हैं। हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, 100 ग्राम सर्विंग में लगभग 155 कैलोरी और 12.6 ग्राम प्रोटीन होता है, जो अंडों को बैलेंस्ड डाइट का एक ज़रूरी हिस्सा बनाता है।
हालांकि, पोल्ट्री किसानों के लिए स्थिति अभी भी अनिश्चित है। एक्सपोर्ट मार्केट के अचानक नुकसान से प्रॉफिट को लेकर चिंताएं पैदा हुई हैं, क्योंकि घरेलू कीमतें शायद विदेशों में हुए रेवेन्यू के नुकसान की भरपाई न कर पाएं। मार्केट के जानकारों का कहना है कि जब तक खाड़ी देशों से एक्सपोर्ट डिमांड फिर से शुरू नहीं होती और ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम नॉर्मल नहीं हो जाता, तब तक कीमतें कम रह सकती हैं।
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जब तक एक्सपोर्ट रूट ठीक नहीं हो जाते और नॉर्मल ट्रेडिंग फिर से शुरू नहीं हो जाती, तब तक घरेलू मार्केट के सरप्लस को सोखने की उम्मीद है, जिससे कीमतें कम रहेंगी और किसानों पर और दबाव पड़ेगा।