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शेयर मार्केट की ABC: शेयर बाजार से कमाई पर भी टैक्स; जानिए क्या कहते हैं डिविडेंड, कैपिटल गेन और FIFO के नियम
- Written By: मनोज आर्या
Share Market Taxation Guide: भारतीय टैक्स नियमों के तहत डीमैट खाते में रखे गए शेयरों और म्यूचुअल फंड यूनिट्स के लिए लागत और होल्डिंग अवधि की गणना इसी एफआईएफओ पद्धति से की जाती है।

कॉन्सेप्ट फोटो, (सोर्स- सोशल मीडिया)
Income Tax on Share Profit: शेयर बाजार में निवेश से होने वाली कमाई पर भी इनकम टैक्स के नियम लागू होते हैं। आमतौर पर निवेशकों को शेयर बाजार से दो तरीकों से आय होती है। पहला कंपनियों द्वारा दिया जाने वाला डिविडेंड और दूसरा शेयर बेचकर होने वाला कैपिटल गेन। इन दोनों तरह की आय पर टैक्स के नियम अलग-अलग होते हैं। इसलिए निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि इनकम टैक्स की गणना कैसे होती है और एफआईएफओ जैसे नियम इसमें क्या भूमिका निभाते हैं।
अगर किसी निवेशक को कंपनी से डिविडेंड मिलता है तो उसे उसकी कुल आय में जोड़ा जाता है। इनकम टैक्स एक्ट के अनुसार, यह आय ‘अन्य स्रोतों से आय’ के अंतर्गत आती है और इस पर व्यक्ति के लागू इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स देना होता है। इसका मतलब यह है कि कम आय वाले निवेशकों पर टैक्स का बोझ कम होगा, जबकि ज्यादा आय वालों को अधिक टैक्स देना पड़ सकता है।
लोन ब्याज पर टैक्स में कुछ राहत
जानकारों के मुताबिक, अगर किसी निवेशक ने शेयर खरीदने के लिए लोन लिया है, तो उस लोन पर दिए गए ब्याज पर टैक्स में कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि यह कटौती कुल डिविडेंड इनकम के अधिकतम 20 प्रतिशत तक ही सीमित रहती है। ब्रोकरेज, कमीशन या सर्विस चार्ज जैसे अन्य खर्चों पर कोई टैक्स छूट नहीं मिलती।
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LTCG और STCG में क्या अंतर?
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी निवेशक को 1 लाख रुपये का डिविडेंड मिला है और उसने शेयर खरीदने के लिए लिए गए लोन पर 35,000 रुपये का ब्याज दिया है, तो वह अधिकतम 20,000 रुपये तक की ही कटौती का दावा कर सकता है। ऐसे में उसकी टैक्सेबल डिविडेंड इनकम 80,000 रुपये मानी जाएगी। वहीं, शेयर बेचने से होने वाले मुनाफे को पूंजीगत लाभ यानी कैपिटल गेन कहा जाता है। होल्डिंग अवधि के आधार पर इसे दो भागों में बांटा जाता है। पहला, लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (एलटीसीजी) और दूसरा, शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (एसटीसीजी)।
1.25 लाख रुपये तक कोई टैक्स नहीं
अगर किसी निवेशक ने लिस्टेड शेयरों को 12 महीने से ज्यादा समय तक अपने पास रखा है, तो उन्हें बेचने से होने वाला मुनाफा दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ यानी एलटीसीजी माना जाता है। ऐसे मामलों में 1.25 लाख रुपये तक के लाभ पर कोई टैक्स नहीं लगता, जबकि इससे अधिक लाभ पर 12.5 प्रतिशत की दर से टैक्स लगाया जाता है। यह नियम तभी लागू होता है जब शेयर खरीदते और बेचते समय सिक्योर्टीज ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) का भुगतान किया गया हो।
वहीं अगर शेयरों को 12 महीने से कम समय तक रखने के बाद बेचा जाता है, तो उससे होने वाला लाभ अल्पकालिक पूंजीगत लाभ यानी एसटीसीजी माना जाता है, जिस पर 20 प्रतिशत की दर से टैक्स लगाया जाता है, बशर्ते कि उस लेनदेन पर एसटीटी का भुगतान किया गया हो।
क्या कहते हैं FIFO के नियम?
इसके अतिरिक्त, शेयर बाजार में अक्सर निवेशक एक ही कंपनी के शेयर अलग-अलग समय पर खरीदते हैं। ऐसे में जब वे शेयर बेचते हैं तो यह तय करना जरूरी होता है कि कौन से शेयर पहले बेचे गए। इसके लिए एफआईएफओ यानी ‘फर्स्ट-इन, फर्स्ट-आउट’ नियम लागू होता है। इस नियम के अनुसार, डीमैट खाते में सबसे पहले खरीदे गए शेयरों को ही सबसे पहले बेचा हुआ माना जाता है।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारतीय टैक्स नियमों के तहत डीमैट खाते में रखे गए शेयरों और म्यूचुअल फंड यूनिट्स के लिए लागत और होल्डिंग अवधि की गणना इसी एफआईएफओ पद्धति से की जाती है। इससे टैक्स गणना में पारदर्शिता और एकरूपता बनी रहती है और निवेशक अपनी सुविधा के अनुसार अलग-अलग लॉट चुनकर टैक्स बचाने की कोशिश नहीं कर पाते।
दो अलग-अलग डीमैट अकाउंट फायदेमंद
कई विशेषज्ञों का मानना है कि निवेशकों के लिए दो अलग-अलग डीमैट अकाउंट रखना फायदेमंद हो सकता है। एक खाता लंबी अवधि के निवेश के लिए और दूसरा ट्रेडिंग के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे टैक्स प्रबंधन ज्यादा आसान हो जाता है। अगर सभी लेनदेन एक ही डीमैट खाते से किए जाते हैं, तो एफआईएफओ नियम के कारण कई बार ऐसा हो सकता है कि आपकी कम लागत वाली और लंबे समय से रखी गई होल्डिंग्स पहले बिकी हुई मानी जाएं, जिससे अल्पकालिक पूंजीगत लाभ पर ज्यादा टैक्स लग सकता है। अलग-अलग खातों के इस्तेमाल से दीर्घकालिक निवेश और अल्पकालिक ट्रेडिंग के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आसान हो जाता है।
यह भी पढ़ें: Share Market Update: भारतीय शेयर बाजार में उछाल, सेंसेक्स 75826 और निफ्टी 23493 के स्तर पर मजबूती के साथ खुला
हालांकि, कई डीमैट खाते रखना पूरी तरह वैध है और नियामक संस्थाएं इसकी अनुमति देती हैं। लेकिन निवेशकों को अपने सभी खातों में किए गए लेनदेन को अपने पैन के आधार पर आयकर रिटर्न में घोषित करना जरूरी होता है।
Share market taxation guide capital gain dividend and fifo rules explained
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