चुनाव जीत जाएंगे, लेकिन देश का भविष्य? मुफ्त की रेवड़ी पर RBI के पूर्व गवर्नर की चेतावनी
Freebies Politics: भारत में चुनावों आते ही जनता पर मुफ्त उपहारों और नकद वादों की बारिश शुरू हो जाती। हर पार्टी एक-दूसरे से बढ़ा चढ़कर वादे करती है। इसको लेकर पूर्व RBI गवर्नर ने गंभीर चिंता व्यक्त की।
- Written By: सौरभ शर्मा
मुफ्त की रेवड़ी पर RBI के पूर्व गवर्नर की सीधी चेतावनी (फोटो- सोशल मीडिया)
RBI former governor on freebies scheme: भारत में चुनावों का मौसम आते ही जनता पर मुफ्त उपहारों और नकद वादों की बारिश शुरू हो जाती है। हर पार्टी एक-दूसरे से बढ़ा चढ़कर वादे करती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसका देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है? इसी गंभीर मुद्दे पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर डी. सुब्बाराव ने एक बड़ी चेतावनी दी है। उनका कहना है कि ये तरीके आपको चुनाव तो जिता सकते हैं, लेकिन इससे एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता।
सुब्बाराव ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हर चीज मुफ्त में देने का वादा करना दरअसल राजनीतिक विफलता की स्वीकृति है। जब सरकारें शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने और लोगों की आजीविका में स्थायी सुधार लाने में नाकाम रहती हैं, तो वे ऐसे शॉर्टकट अपनाती हैं। यह ट्रेंड खतरनाक है क्योंकि यह उन जरूरी क्षेत्रों में निवेश को रोक देता है जो देश के लंबे समय तक विकास के लिए बेहद आवश्यक हैं।
बिहार चुनाव और वादों की होड़
अपनी बात को समझाने के लिए सुब्बाराव ने बिहार और आंध्र प्रदेश के चुनावों का उदाहरण दिया। उन्होंने बिजनेस टुडे और टीओआई की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि कैसे बिहार चुनाव में एनडीए ने महिलाओं को 10 हजार रुपये देने की बात कही, तो वहीं विपक्षी महागठबंधन ने बोली बढ़ाकर 30 हजार रुपये और हर घर को सरकारी नौकरी देने का वादा कर दिया। सुब्बाराव के मुताबिक इन वादों में हकीकत कहीं नहीं थी, ऐसा लग रहा था मानो राजनीतिक वर्ग ने सारे वित्तीय गणित और बजट को किनारे रख दिया हो। यह केवल एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ थी।
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जीत के बाद वादे बने मुसीबत
पूर्व गवर्नर का तर्क है कि जब सभी पार्टियां ऐसे बड़े वादे करती हैं, तो ये मुफ्त चीजें एक-दूसरे के प्रभाव को खत्म कर देती हैं। इससे शायद कुछ वोट मिल जाएं, लेकिन जनता का नेताओं पर से भरोसा कम होने लगता है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि चुनाव जीतने के बाद चुनी हुई सरकारें इन भारी-भरकम वादों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। सुब्बाराव ने चेताया कि हवा-हवाई नकद वादों की वजह से सरकारें दबाव में हैं और देश निर्माण का असली काम पीछे छूटता जा रहा है।
