

Rupee Falls Against Dollar: आजकल भारतीय रुपये की कमजोरी एक बार फिर बाजार में चर्चा का विषय बनी हुई है। इस समय डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 96 रुपये के आसपास कारोबार कर रहा है। कोटक सिक्योरिटीज के करेंसी और कमोडिटी रिसर्च हेड अनिंद्य बनर्जी के आकलन के अनुसार, यदि 97 का स्तर टूटता है तो रुपया गिरकर 98.50 से 99 रुपये प्रति डॉलर तक कमजोर हो सकता है। इसके बाद से तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे हैं कि अगर वास्तव में ऐसा हो जाता है तो क्या होगा..?
हाल के बाजार रुझानों में भी भारतीय मुद्रा पर दबाव साफ तौर पर देखा गया है। बीती 29 सितंबर को रुपया लगभग 96.15 रुपये प्रति डॉलर के स्तर तक फिसल गया था। अगर रुपये में यह गिरावट आगे भी जारी रहती है, तो इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी के बजट पर पड़ेगा।
रुपये पर दबाव बढ़ने के पीछे कई अहम कारण हैं। पहला कारण विदेशी निवेशकों की बिकवाली है, जिन्होंने सितंबर 2026 में भारतीय शेयर बाजार से करीब 2.7 अरब डॉलर निकाल लिए हैं। दूसरा कारण वैश्विक स्तर पर डॉलर की मजबूत मांग और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में आई तेजी है, जिससे निवेशक भारतीय परिसंपत्तियों से पैसा निकालकर अमेरिका में लगा रहे हैं। इसके अलावा महंगा कच्चा तेल भी भारत के आयात बिल को बढ़ा रहा है।
भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चा तेल महंगा होता है और साथ में रुपया भी कमजोर होता है, तो तेल आयात की लागत काफी बढ़ जाती है। इसका सीधा दबाव पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों पर पड़ता है। ट्रांसपोर्टेशन महंगा होने से फल, सब्जियां और रोजमर्रा की जरूरी चीजें भी महंगी हो सकती हैं।
विदेश में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों के बजट पर इसका बड़ा असर पड़ेगा। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी छात्र की फीस 20,000 डॉलर है, तो 96 की विनिमय दर पर उसे 19.20 लाख रुपये देने पड़ते थे। लेकिन अगर रुपया गिरकर 99 प्रति डॉलर हो जाता है, तो वही फीस 19.80 लाख रुपये हो जाएगी, यानी सीधे 60,000 रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। ठीक इसी तरह, विदेशों में घूमना, होटल बुकिंग और फ्लाइट टिकट भी काफी महंगे हो जाएंगे।
भारत में कई कंपनियां उत्पादन के लिए विदेशों से कच्चा माल, मशीनरी और पुर्जे आयात करती हैं। रुपया कमजोर होने से कंपनियों को वही सामान खरीदने के लिए ज्यादा रुपये चुकाने पड़ेंगे। इसका असर मोबाइल, लैपटॉप, गैजेट्स और अन्य आयातित उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है, जिससे इलेक्ट्रॉनिक सामान महंगे हो सकते हैं।
कमजोर रुपये का हर असर नकारात्मक ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है। जिन भारतीय कंपनियों को विदेश से डॉलर में भुगतान मिलता है, उन्हें इसका फायदा हो सकता है। उदाहरण के लिए, IT और फार्मा सेक्टर की एक्सपोर्ट कंपनियों की डॉलर में होने वाली कमाई रुपये में बदल जाने पर बढ़ जाएगी। हालांकि, आयात महंगा होने से देश का व्यापार घाटा और जिन कंपनियों ने डॉलर में कर्ज लिया है, उन पर बोझ जरूर बढ़ेगा।