

Highlights:
IDBI बैंक के बाद सरकार चार और बैंकों में अपनी हिस्सेदारी बेचने जा रही है।
सरकार के हिस्सेदारी बेचने से आम निवेशकों के लिए शेयरों की उपलब्धता बढ़ेगी।
सरकार दो अन्य सरकारी बैंकों के निजीकरण की संभावना भी तलाश रही है।
Bank Privatisation Update: आईडीबीआई बैंक के बाद केंद्र सरकार चार और सरकारी बैंकों में अपनी हिस्सेदारी बेचने की योजना बना रही है। मीडिया रिपोर्ट्स में किए जा रहे दावे के मुताबिक, पंजाब एंड सिंध बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक, यूको बैंक और सेंट्रल बैंक में केंद्र अपनी हिस्सेदारी 75 प्रतिशत तक ला सकती है। अभी इन बैंकों में सरकार के पास क्रमश: 93.85%, 92.44%, 90.95% और 81.19% हिस्सेदारी हैं।
सरकार के हिस्सेदारी बेचने से इन बैंकों में आम निवेशकों के लिए शेयरों की उपलब्धता बढ़ेगी। सरकार दो अन्य सरकारी बैंकों के निजीकरण की संभावना भी तलाश रही है। हालांकि, इन बैंकों की बिक्री पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
आईडीबीआई बैंक में सरकार और एलआईसी की कुल 60.72% हिस्सेदारी कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स समर्थित कंपनी को 52,878 करोड़ रुपये में बेचने की मंजूरी दी गई है। इस सौदे से सरकार को विनिवेश के लक्ष्य से ज्यादा रकम जुटाने में मदद मिल सकती है।
बता दें कि केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 में विनिवेश (सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचना) से 80 हजार करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है। 10 सितंबर तक 62,124 करोड़ रुपये जुटाए जा चुके थे।
शेयर बिक्री से 55,757 करोड़ और संपत्तियां बेचने से 6,367 करोड़ मिले। आईडीबीआई बैंक की डील पूरी होने पर सरकार की कुल प्राप्तियां करीब 88 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।
कैपिटल मार्केट रेग्युलेटर सेबी के दिशानिर्देशों के अनुसार, लिस्टेड कंपनियों में कम से कम 25% हिस्सेदारी आम जनता के पास होनी चाहिए। केंद्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) और बैंकों को 25% पब्लिक शेयरहोल्डिंग का नियम पूरा करने के लिए छूट दी थी, जिसकी समय-सीमा नजदीक आ रही है।
ऐसे में सरकार OFS (ऑफर फॉर सेल) या QIP (क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट) के जरिए शेयर बाजार में अपनी हिस्सेदारी धीरे-धीरे कम करने की योजना पर काम कर रही है।
यह ध्यान देना जरूरी है कि हिस्सेदारी में 75% तक की कटौती पूर्ण रूप से निजीकरण नहीं है।इस कदम का मुख्य उद्देश्य बैंकों का शेयर बाजार में पब्लिक फ्लोट बढ़ाना और उनकी लिक्विडिटी में सुधार करना है, जिससे बैंक की मार्केट वैल्यूएशन बेहतर हो सके।
पूर्ण निजीकरण में बैंक का मालिकाना हक निजी हाथों में सौंपा जाता है। हालांकि, NITI आयोग ने पूर्व में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक को निजीकरण के संभावित उम्मीदवारों के रूप में शॉर्टलिस्ट किया था, लेकिन इसके लिए संसद में बैंकिंग कानून (संशोधन) विधेयक पारित करना अनिवार्य होगा।
आम खाताधारकों के डिपॉजिट्स, ब्याज दरों या बैंक सेवाओं पर इसका कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। सभी बैंक सरकारी नियंत्रण और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के कड़े दिशानिर्देशों के तहत ही ऑपरेट होते रहेंगे। बाजार में ज्यादा शेयर्स आने से निवेशकों के लिए ट्रेडिंग के नए अवसर बनेंगे और बैंकों के शेयर मूल्यांकन में पारदर्शिता आएगी।