क्लीन मैक्स आईपीओ, (सोर्स- सोशल मीडिया)
नवभारत के लिए विष्णु भारद्वाज की रिपोर्ट-
Risk In Expensive IPOs: जो संस्थागत निवेशक यानी फंड हाउस यानी 20 से 30 के पीई रेशियो पर भी भारतीय शेयर बाजार को महंगा बता कर मंदी ला रहे हैं, वे ही फंड हाउस 100 से 1,000 के पीई रेशियो पर काफी महंगे आईपीओ (IPO) लाने वाली कंपनियों में बेधड़क निवेश कर रिटेल निवेशकों की जमा पूंजी को दांव पर लगा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण है ग्रीन एनर्जी सेक्टर के सबसे महंगे आईपीओ क्लीन मैक्स एनवायरो एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड (CleanMax Enviro Energy Solutions Ltd।) में 41 एंकर इन्वेस्टर्स ने 921 करोड़ रुपये का निवेश किया है।
400 के प्राइस-टू-अर्निंग रेशियो (P/E Ratio) की सर्वाधिक महंगी वैल्यूएशन पर लाए गए क्लीन मैक्स के आईपीओ में इन संस्थागत निवेशकों ने एंकर इन्वेस्टर्स के रूप में 1,053 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से 87.46 लाख से अधिक इक्विटी शेयर खरीदे हैं। पिछले साल तक घाटे में रही क्लीन मैक्स का 3100 करोड़ रुपये का आईपीओ 23 फरवरी को खुला और 25 फरवरी को बंद होगा। पहले दिन सोमवार को क्लीन मैक्स आईपीओ में काफी महंगे वैल्यूएशन के कारण रिटेल निवेशक तो दूर रहे।
पहले दिन रिटेल श्रेणी में मात्र 2 प्रतिशत ही निवेश मिला। जबकि क्यूआईबी श्रेणी में कई संस्थागत निवेशकों ने ही क्लीन मैक्स के 61.40 लाख शेयर और खरीद लिए। यह बड़ा सवाल है कि इन फंडों ने लाखों रिटेल निवेशकों का पैसा इतनी महंगी कीमत पर इस जोखिम भरे आईपीओ में क्यों इन्वेस्ट किया? क्या सेबी अधिकारी इस गंभीर मुद्दे पर ध्यान देंगे?
क्लीन मैक्स ने अपने 1 रुपये फेस वैल्यू वाले इक्विटी शेयर का मूल्य 1,053 रुपये रखा है। यदि 10 रुपये फेस वैल्यू से गणना की जाए तो क्लीन मैक्स के शेयर की कीमत 10,530 रुपये यानी 10 हजार रुपये से अधिक होती है। सोलर और विंड पावर उत्पादक क्लीन मैक्स को वित्त वर्ष 2023 और 2024 में 97 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था और वित्त वर्ष 2025 में इसे मात्र 19 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हुआ और ईपीएस सिर्फ 2.80 रुपये रही।
19 करोड़ का मामूली प्रॉफिट कमाने वाली क्लीन मैक्स के आईपीओ में जिन संस्थागत निवेशकों ने एंकर इन्वेस्टर्स के रूप में इन्वेस्ट किया है, उनमें टेमासेक होल्डिंग्स, नोमुरा, ईस्टस्प्रिंग, एचडीएफसी, टाटा इन्वेस्टमेंट, अबू धाबी इन्वेस्टमेंट, फ्रैंकलिन टेम्पलटन म्यूचुअल फंड, एसबीआई लाइफ, एसबीआई जनरल, प्रेमजी इनवेस्ट, 360 वन म्यूचुअल फंड, सोसाइटी जनरल, सिटीग्रुप ग्लोबल, इंडिया फर्स्ट लाइफ इंश्योरेंस, केनरा HSBC लाइफ और भारती एक्सा लाइफ इंश्योरेंस शामिल हैं।
इनमें कई इंडियन फंड हाउस हैं, जिनमें लाखों रिटेल निवेशकों की जमा पूंजी लगी हुई हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्लीन मैक्स के इतने महंगे आईपीओ में इन फंड हाउस ने रिटेल निवेशकों का पैसा दांव पर क्यों लगाया? जबकि विगत वर्षों में लाए गए पेटीएम, ओला, स्विगी, फर्स्टक्राई, नायका, मीशो, जारो, विक्रम सोलर, डैम कैपिटल सहित अनेक महंगे आईपीओ में भारी नुकसान उठाना पड़ा है। फिर ऐसी क्या ‘मजबूरी’ है या कोई ‘स्वार्थ’ है, जिसके कारण ये फंड हाउस फिर भी इन महंगे आईपीओ में करोड़ों निवेश कर रहे हैं?
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क्लीन मैक्स मैनेजमेंट और उसके लालची मर्चेंट बैंकर आईपीओ में जिस महंगी काल्पनिक वैल्यूएशन को उचित बता रहे हैं। यदि उन्हें आगे कंपनी में बंपर प्रॉफिट की उम्मीद है तो फिर प्रमोटर और संस्थागत निवेशक अपनी हिस्सेदारी क्यों बेच रहे हैं? इस 3100 करोड़ के आईपीओ का उद्देश्य कर्ज भुगतान करना है, लेकिन 3100 करोड़ में से 1900 करोड़ तो ऑफर फॉर सेल (OFS) है।
कंपनी को कर्ज चुकाने के लिए मात्र 1200 करोड़ रुपये ही मिलेंगे। जबकि कंपनी पर 8,000 करोड़ रुपये से अधिक का भारी कर्ज बोझ है। इससे साफ जाहिर है कि यह आईपीओ कंपनी का कर्ज बोझ कम करने के लिए नहीं बल्कि प्रमोटरों और पुराने निवेशकों की जेब भरने के लिए लाया गया है। फिर भी 41 एंकर इन्वेस्टर्स ने 921 करोड़ रुपये लगा डाले। यह चिंता का विषय है।