सिंहेश्वर विधानसभा: 2020 में चिराग ने पहुंचाया था नुकसान, इस बार जदयू को वापस मिलेगी कमान?

Bihar Assembly Elections: अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित मधेपुरा जिले की सिंहेश्वर विधानसभा सीट सामाजिक और धार्मिक महत्व के साथ-साथ राजनीतिक तौर पर भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
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सिंहेश्वर विधानसभा सीट (डिजाइन फोटो)
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Singheshwar Assembly Constituency: बिहार के चुनावी महाभारत के एक मोर्चे के तौर पर सिंहेश्वर विधानसभा सीट भी चर्चा में है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित यह सीट सामाजिक और धार्मिक महत्व के साथ-साथ राजनीतिक तौर पर भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। साल 2008 में परिसीमन के बाद यह सीट मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र से हटकर सुपौल लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा बन चुकी है।

सिंहेश्वर को धार्मिक रूप से एक अत्यंत पवित्र स्थल माना जाता है। यहां का प्रसिद्ध सिंहेश्वरनाथ महादेव मंदिर, जिसे 'कामना लिंग' के नाम से जाना जाता है, लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यहीं पर ऋषि श्रृंगी ने राजा दशरथ के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ किया था, जिसके फलस्वरूप श्रीराम और उनके भाइयों का जन्म हुआ।

पुराणों में मिलता है सिंहेश्वर का उल्लेख

इस क्षेत्र का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है और यह न केवल शिव उपासना का केंद्र है, बल्कि आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। मंदिर के परिसर में मां सिंहेश्वरी के रूप में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की उपस्थिति, त्रिदेवों की स्थापना और भगवान बुद्ध की मूर्ति इस धार्मिक स्थल की विविधता को दर्शाते हैं। भौगोलिक रूप से यह क्षेत्र कोसी नदी की धारा में स्थित है और बाढ़ के साथ जीने की मजबूरी यहां की जीवनशैली का हिस्सा बन चुकी है। कृषि ही यहां की मुख्य आजीविका है, जिसमें धान, मक्का, गेहूं और दालें प्रमुख हैं। औद्योगिक विकास सीमित है, जिससे सीमांत किसान और भूमिहीन मजदूर अक्सर आजीविका की तलाश में पलायन करते हैं।

सिंहेश्वर विधानसभा का चुनावी इतिहास

राजनीतिक दृष्टि से सिंहेश्वर विधानसभा सीट की भूमिका अहम रही है। 1977 में पहली बार चुनाव हुए और अब तक 12 बार चुनाव संपन्न हो चुके हैं, जिनमें 1981 का उपचुनाव भी शामिल है। 2005 से 2015 तक लगातार चार बार जदयू ने यहां जीत दर्ज की, लेकिन 2020 के चुनाव में यह सिलसिला टूट गया। उस वर्ष राजद के चंद्रहास चौपाल ने जदयू के नरेंद्र नारायण यादव को 5,573 मतों से हराकर नया इतिहास रच दिया। यह उन 25 सीटों में से एक थी, जहां चिराग पासवान की लोजपा ने एनडीए से अलग होकर केवल जदयू को नुकसान पहुंचाने की रणनीति अपनाई थी। दिलचस्प रूप से लोजपा को मिले वोटों की संख्या राजद की जीत के अंतर से 34 ज्यादा थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि त्रिकोणीय मुकाबला यहां निर्णायक साबित हुआ।

जदयू और राजद के बीच होगी जंग

राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो सिंहेश्वर में मुकाबला मुख्य रूप से राजद और जदयू के बीच बना हुआ है। चंद्रहास चौपाल 2020 की जीत के बाद फिर से मैदान में उतरने को तैयार हैं, वहीं जदयू इस सीट को पुनः जीतने के लिए रणनीति बना रही है। भाजपा की भूमिका यहां सहयोगी दल के रूप में ही रही है, क्योंकि यह सीट उसके कोर वोट बैंक में नहीं आती।

चुनाव आयोग के अनुसार, 2024 में सिंहेश्वर विधानसभा की कुल अनुमानित जनसंख्या 5,41,506 है, जिसमें पुरुषों की संख्या 2,78,118 और महिलाओं की संख्या 2,63,388 है। वहीं, मतदाताओं की कुल संख्या 3,29,079 है, जिसमें 1,70,755 पुरुष, 1,58,315 महिलाएं और 9 थर्ड जेंडर हैं।

सिंहेश्वर के चुनावी मुद्दे क्या हैं?

2025 के चुनाव में सिंहेश्वर में मुद्दे वही रहेंगे जो वर्षों से यहां की जमीनी हकीकत रहे हैं। बाढ़ नियंत्रण, पलायन रोकना, कृषि संकट, दलित समाज के अधिकार और धार्मिक पर्यटन का समुचित विकास। हालांकि, विकास के नाम पर मंदिर क्षेत्र में आंशिक सुधार हुए हैं, परंतु बड़े पैमाने पर रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में अब भी व्यापक सुधार की जरूरत है।

(एजेंसी इनपुट के साथ)

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