JDU के सामने सबसे बड़ा संकट: नीतीश कुमार चूके तो BJP निगल जाएगी पार्टी, बिहार में फूटा नया सियासी बम
Nitish Kumar and Nishant Kumar: खालीपन का शोर सबसे ख़तरनाक होता है...और बिहार की सियासत इन दिनों इसी खालीपन का शोर सुनाई दे रहा है। यह खालीपन सत्ताधारी पार्टी जेडीयू के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।
- Written By: अभिषेक सिंह
नीतीश कुमार (डिजाइन फोटो)
Bihar Politics: खालीपन का शोर सबसे ख़तरनाक होता है…और बिहार की सियासत इन दिनों इसी खालीपन का शोर सुनाई दे रहा है। यह खालीपन सत्ताधारी पार्टी जनता दल यूनाइटेड के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह दसवां कार्यकाल है और उनकी उम्र 74 पार कर चुकी है। सियासी हलकों में उनके स्वास्थ्य को लेकर भी समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। यही वजह कि वह यक्ष प्रश्न फिर सबके सामने है। जिसमें यह पूछा जाता है कि नीतीश के बाद जेडीयू को कौन संभालेगा?
दरअसल, जनता दल यूनाइटेड पूरी तरह नीतीश कुमार के व्यक्तित्व, फैसलों और सियासी कौशल पर टिकी रही है। एक समय में यही इसकी सबसे बड़ी ताकत हुआ करती थी, लेकिन अब उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनती दिख रही है। ऐसे में यह सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि जेडीयू या नीतीश कुमार ने आज तक कोई औपचारिक उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया है।
‘वन मैन आर्मी’ है जनता दल यूनाटेड
जानकारों के मुताबिक, जेडीयू हमेशा से एक नेता-केंद्रित पार्टी रही है। संगठन कभी भी इतना मज़बूत नहीं रहा कि वह अपने नेता के बिना अपना रास्ता खुद तय कर सके। नीतीश कुमार ही पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं फैसले लेने वाले हैं और उसकी वैचारिक रीढ़ हैं। इसलिए यह डर स्वाभाविक है कि नीतीश के बिना जेडीयू का चुनावी और सामाजिक आधार कमजोर हो सकता है।
सम्बंधित ख़बरें
‘कोई उलझाएगा तो खुद ही बचना होगा…’, CM मोहन यादव ने प्रशिक्षण कार्यक्रम में नवनियुक्त अध्यक्षों को दी सलाह
आगे ऑटो में विधायक, पीछे फॉर्च्यूनर से शूटिंग! PM मोदी की अपील का ऐसा असर देख चकराए लोग- VIDEO
घुसपैठियों को बसने देना बंगाल की…मंत्री दिलीप घोष का बड़ा दावा, कहा- जम्मू-कश्मीर से भी बुरे हालात
MP BJP Performance Report Card: BJP में ‘परफॉर्मेंस कार्ड’ पर घमासान, आपसी कलह सड़क पर आई, विपक्ष ने घेरा
निशांत सियासत में आए तो क्या होगा?
यही वजह है कि उत्तराधिकार का सवाल अब भविष्य की चिंता नहीं, बल्कि मौजूदा संकट बन गया है। इस संदर्भ में मुख्यमंत्री के बेटे निशांत कुमार के नाम पर अक्सर चर्चा हो रही है। लेकिन सवाल यह है: क्या निशांत कुमार राजनीति में आ रहे हैं? अगर हां तो इसके सकारात्मक और नकारात्मक पहलू क्या होंगे?
वहीं ध्यान देने वाली बात यह भी है कि निशांत कुमार अब तक राजनीति से दूर रहे हैं। उन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा है या कोई संगठनात्मक भूमिका नहीं निभाई है। इसके बावजूद पार्टी के अंदर और बाहर जोरदार अटकलें हैं कि आने वाले सालों में उन्हें धीरे-धीरे राजनीति में लाया जा सकता है।
निशांत को स्वीकार कर पाएगा बिहार?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर निशांत कुमार राजनीति में आते हैं तो यह अचानक एंट्री नहीं होगी, बल्कि एक ‘सॉफ्ट लॉन्च’ होगा। पहले संगठन में कोई भूमिका फिर किसी विधायी निकाय की सदस्यता और बाद में नेतृत्व की ज़िम्मेदारियां। हालांकि, असली सवाल यह नहीं है कि निशांत राजनीति में आएंगे या नहीं। बड़ा सवाल यह है: क्या जेडीयू के कार्यकर्ता और वोटर उन्हें स्वीकार करेंगे?
जेडीयू दफ्तर के बाहर लगा पोस्टर (सोर्स- सोशल मीडिया)
बिहार की इस सियासी हलचल पर राजनैतिक जानकारों का कहना है कि निशांत कुमार में फिलहाल राजनीतिक अनुभव, लोकप्रिय आधार और वह करिश्मा नहीं है जो नीतीश कुमार की पहचान है। पार्टी के अंदर भी कई अनुभवी नेता हैं जिन्हें यह स्वीकार करना मुश्किल होगा कि नेतृत्व सीधे परिवार के किसी सदस्य को सौंप दिया जाए। यही वजह है कि सुरक्षित दिखने के बावजूद, इस रास्ते को जोखिम भरा माना जा रहा है।
बिहार में सबसे अहम खिलाड़ी है BJP
पॉलिटिकल एनालिस्टों के मुताबिक, इस पूरे समीकरण में सबसे बड़ा और सबसे अहम खिलाड़ी बीजेपी है। पिछले कुछ सालों में बीजेपी और जेडीयू के बीच रिश्ता अब बराबरी का नहीं रहा है। जेडीयू अब बीजेपी पर राजनीतिक रूप से ज्यादा निर्भर दिखती है। लोकसभा से लेकर राज्य विधानसभा तक बीजेपी का समर्थन आधार बढ़ा है। जबकि जेडीयू का सिकुड़ा है। इस स्थिति में नीतीश कुमार की गतिविधि में थोड़ी सी भी कमी बीजेपी के लिए एक मौका बन सकती है।
नीतीश चूके तो खत्म हो जाएगी पार्टी!
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, राजनीतिक संकेत साफ हैं। अगर नीतीश कुमार कमज़ोर पड़ते हैं या राजनीति से हट जाते हैं तो बीजेपी उन पर मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर दबाव डाल सकती है या जेडीयू को जूनियर पार्टनर की भूमिका तक सीमित कर सकती है। बीजेपी का लक्ष्य कोई राज नहीं है, बल्कि बिहार में स्थायी नेतृत्व और पूरा कंट्रोल चाहती है। इसके लिए नीतीश कुमार पर निर्भरता खत्म करना और यह पक्का करना जरूरी है कि जेडीयू बहुत मज़बूत स्थिति में न रहे। इसीलिए 2026 को जेडीयू के लिए असली परीक्षा का साल माना जा रहा है।
क्यों टेंशन में है जेडीयू समर्थक
अगर इस चुनाव से पहले उत्तराधिकार की तस्वीर साफ नहीं होती है तो पार्टी के टूटने का खतरा बढ़ सकता है। कुछ नेता बीजेपी में जा सकते हैं, कुछ आरजेडी में और कुछ अलग गुट बना सकते हैं। राजनीतिक इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। चाहे वह शरद पवार के बाद एनसीपी में फूट हो या मुलायम सिंह यादव के बाद समाजवादी पार्टी में झगड़ा–नेतृत्व की कमी पार्टी को कमजोर कर देती है। डर है कि जेडीयू भी उसी रास्ते पर जा सकती है।
नीतीश कुमार के सामने हैं तीन रास्ते
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, जेडीयू के पास अभी तीन विकल्प हैं। पहला, नीतीश कुमार को खुद सक्रिय रहते हुए ही उत्तराधिकारी तय कर देना चाहिए ताकि पार्टी की पहचान बनी रहे। दूसरा, वह फैसले को टालते रह सकते हैं, जिससे बीजेपी को और मौके मिलेंगे। तीसरा, वह बहुत ज्यादा देर कर सकते हैं, और हालात ही नतीजा तय करेंगे। इन तीनों में से पहला विकल्प बेशक मुश्किल है, लेकिन यह जेडीयू के लिए सबसे सुरक्षित भी है। दूसरा विकल्प सबसे ज्यादा मुमकिन लगता है, जबकि तीसरा पार्टी के लिए सबसे खतरनाक साबित हो सकता है।
यह भी पढ़ें: इधर टूट की कगार पर पार्टी…उधर बहू की सियासी सेटिंग में जुटे कुशवाहा, ये कदम साबित होगा आखिरी कील?
अंततः यह कह सकते हैं कि तस्वीर काफी साफ है। अगर नीतीश कुमार समय पर फैसला लेते हैं, तो जेडीयू खुद को बचा सकती है। अगर फैसला देर से होता है तो बीजेपी फैसला करेगी। वहीं अगर बहुत ज़्यादा देर हो गई तो जेडीयू अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती रह जाएगी। सवाल अब यह नहीं है कि उत्तराधिकार होगा या नहीं; एकमात्र सवाल यह है–क्या नीतीश कुमार फैसला करेंगे या राजनीतिक हालात उनके लिए फैसला करेंगे?
