बिहार चुनाव 2025: नरपतगंज में भाजपा का 20 साल का दबदबा, अबकी बार बदलेगा सियासी समीकरण
Bihar Assembly Elections: नरपतगंज में पहली बार चुनाव 1962 में हुए थे, जिसमें कांग्रेस ने जीत दर्ज की। 1962 से 1972 तक कांग्रेस का दबदबा बना रहा। 1977 में जनता दल ने इस सीट को कांग्रेस से छीन लिया।
- Written By: आकाश मसने
नरपतगंज विधानसभा सीट (डिजाइन फोटो)
Narpatganj Assembly Constituency Profile: अररिया जिले की नरपतगंज विधानसभा सीट बिहार की राजनीति में एक मजबूत भाजपा गढ़ के रूप में जानी जाती है। पिछले दो दशकों से इस सीट पर भाजपा का कब्जा रहा है। 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा अपनी इस स्थिति को बनाए रखने की कोशिश में है, जबकि राजद-नेतृत्व वाला महागठबंधन इस गढ़ को भेदने की रणनीति बना रहा है।
इतिहास की झलक
नरपतगंज में पहली बार चुनाव 1962 में हुए थे, जिसमें कांग्रेस ने जीत दर्ज की। 1962 से 1972 तक कांग्रेस का दबदबा बना रहा। 1977 में जनता दल ने इस सीट को कांग्रेस से छीन लिया। 1985 में भाजपा ने पहली बार यहां जीत हासिल की, लेकिन 1990 और 1995 में जनता दल ने फिर से वापसी की। वर्ष 2000 में भाजपा ने सीट पर कब्जा जमाया, हालांकि 2005 के पहले चुनाव में राजद ने इसे जीत लिया था। उसी साल दोबारा हुए चुनाव में भाजपा ने फिर से सीट हासिल कर ली और तब से 2010, 2015 और 2020 तक लगातार जीत दर्ज करती रही।
2020 का चुनावी परिणाम
2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के जयप्रकाश यादव ने राजद के अनिल कुमार यादव को 28,610 वोटों के अंतर से हराया। इससे पहले 2015 में राजद ने जदयू के साथ गठबंधन में भाजपा को 25,951 वोटों से हराया था। हालांकि जदयू ने कभी स्वतंत्र रूप से इस सीट पर जीत दर्ज नहीं की, लेकिन गठबंधन सहयोगी के रूप में 2015 और 2020 में सक्रिय रही।
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वोटर प्रोफाइल और जातीय समीकरण
2020 में नरपतगंज में 3,28,546 पंजीकृत मतदाता थे, जिनमें 18.65% अनुसूचित जाति, 21.40% मुस्लिम और 18.90% यादव समुदाय के मतदाता शामिल थे। 2024 के लोकसभा चुनाव तक यह संख्या बढ़कर 3,44,243 हो गई है। यह जातीय संरचना चुनावी रणनीति में अहम भूमिका निभाती है, खासकर जब भाजपा और महागठबंधन दोनों अपने-अपने सामाजिक आधार को साधने की कोशिश करते हैं।
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भौगोलिक और आर्थिक चुनौतियां
नरपतगंज विधानसभा क्षेत्र कोसी नदी के बाढ़ प्रभावित इलाके में आता है। यह क्षेत्र पूरी तरह ग्रामीण है और कृषि आधारित आजीविका पर निर्भर है। धान, मक्का और जूट की खेती यहां की प्रमुख फसलें हैं। कोसी नदी जहां एक ओर कृषि के लिए वरदान है, वहीं मानसून के दौरान बाढ़ और जलजमाव की समस्या भी पैदा करती है।
विकास की स्थिति
इस क्षेत्र में औद्योगिक या कृषि-आधारित उद्योगों की कमी के कारण आर्थिक ठहराव बना हुआ है। युवाओं का पलायन एक बड़ी चुनौती है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में भी संसाधनों की कमी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। हालांकि, कुछ क्षेत्रों में सड़क और आधारभूत ढांचे में सुधार हुआ है, लेकिन समग्र विकास की गति धीमी बनी हुई है।
क्या बदलेगा समीकरण?
भाजपा की लगातार जीत ने नरपतगंज को एक सुरक्षित सीट बना दिया है, लेकिन 2025 के चुनाव में महागठबंधन इसे चुनौती देने की तैयारी में है। जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे और विकास की अपेक्षाएं इस बार चुनावी परिणाम को प्रभावित कर सकती हैं। देखना होगा कि क्या भाजपा अपना गढ़ बचा पाती है या विपक्ष इस बार समीकरण बदलने में सफल होता है।
