

Bihar MLC Election Voting Process: बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के लिए होने वाले आगामी चुनावों में सभी राजनीतिक दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। इनमें पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का मुकाबला विशेष रूप से दिलचस्प होता जा रहा है। 'जन सुराज' के उम्मीदवार अनुज सिंह ने अपने चुनाव प्रचार का केंद्र शिक्षित प्रतिनिधित्व, बेरोजगार स्नातकों की चुनौतियां और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दों को बनाया है।
उन्होंने अपना ध्यान जातिगत समीकरणों और राजनीतिक दिखावे पर निर्भर रहने की पारंपरिक परिपाटी से हटाकर इन मुद्दों पर केंद्रित किया है। मोकामा के विधायक अनंत सिंह के समर्थन ने इस चुनावी मुकाबले को लेकर चर्चाओं को और तेज कर दिया है।
इन आठ निर्वाचन क्षेत्रों के लिए मतदान 23 अक्टूबर को होना है। इन सीटों में पटना, दरभंगा, तिरहुत और कोसी के स्नातक निर्वाचन क्षेत्र, तथा पटना, दरभंगा, सारण और तिरहुत के शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं। इन आठ निर्वाचन क्षेत्रों में कुल 933 मतदान केंद्र बनाए गए हैं।
स्नातक कोटे की चार सीटों के लिए 90 उम्मीदवार मैदान में हैं, जबकि शिक्षक कोटे की चार सीटों के लिए 60 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। सीटों की संख्या कम होने के बावजूद, इसमें शामिल राजनीतिक दलों के लिए यह चुनाव काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यहां जानें कि बिहार विधान परिषद MLC चुनाव कैसे होते है। विधान परिषद एक स्थायी 'उच्च सदन' है। इसके सदस्यों का दर्जा विधायकों के बराबर होता है और वे 6 साल के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं। इसमें आम जनता सीधे वोट नहीं डालती।
इसके बजाय, स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि, शिक्षक, स्नातक (ग्रेजुएट्स) और राज्य विधानसभा के मौजूदा विधायक वोट देते हैं। यहां चुनाव किसी राजनीतिक दल के चुनाव चिह्न या केवल सबसे ज़्यादा वोट पाने के आधार पर नहीं होते, बल्कि 'एकल हस्तांतरणीय मत' (Single Transferable Vote) प्रणाली का उपयोग किया जाता है।
इसमें मतदाताओं को एक बैलेट पेपर दिया जाता है, जिस पर वे अपनी पसंद के अनुसार उम्मीदवारों को रोमन अंकों (I, II, III...) में वरीयता (रैंक) दे सकते हैं। अंत में, उस उम्मीदवार की जीत होती है जिसे इन वरीयताओं के आधार पर सबसे अधिक समर्थन मिलता है, न कि केवल कुल वोटों की संख्या के आधार पर। बिहार की राज्य सरकार में कानून बनाने के लिए दो मुख्य सदन होते हैं। एक है 'विधान सभा' और दूसरा है 'विधान परिषद'।
विधान परिषद को राज्य सरकार का 'उच्च सदन' कहा जाता है। विधान सभा के विपरीत, विधान परिषद एक स्थायी सदन है, जो कभी भी पूरी तरह से भंग नहीं होता है। MLC का दर्जा और रुतबा विधायकों के बराबर ही होता है। हर MLC का कार्यकाल 6 साल का होता है। भारत के केवल 6 राज्यों में ही विधान परिषद है, जिनमें से एक बिहार है।
बिहार विधान परिषद में कुल 75 सीटें हैं, जिन्हें पांच अलग-अलग तरीकों से भरा जाता है। 27 सदस्यों को विधायकों (विधान सभा के सदस्यों) द्वारा चुना जाता है। 24 सदस्यों को स्थानीय सरकार के नेताओं (जैसे ग्राम प्रधान, पंचायत सदस्य, ब्लॉक प्रमुख और नगर निकाय प्रतिनिधि) द्वारा चुना जाता है। इसके लिए 12 सदस्यों को नामांकित (सीधे नियुक्त) किया जाता है। 6 सदस्यों को शिक्षकों द्वारा चुना जाता है। 6 सदस्यों को कॉलेज स्नातकों (ग्रेजुएट्स) द्वारा चुना जाता है।
अप्रत्यक्ष चुनाव: इस चुनाव में आम जनता सीधे वोट नहीं देती है। इसके बजाय, मतदाता चुने हुए प्रतिनिधि (जैसे विधायक और स्थानीय नेता) या कुछ खास ग्रुप (जैसे शिक्षक और स्नातक) होते हैं।
कोई पार्टी चिह्न नहीं: मतपत्रों पर उम्मीदवारों के नाम सीधे लिखे होते हैं, उनके साथ कोई राजनीतिक पार्टी का चिह्न नहीं होता।
वरीयता प्रणाली: मतदान के लिए 'सिंगल ट्रांसफरेबल वोटिंग' (एकल हस्तांतरणीय मतदान) नामक पद्धति का उपयोग किया जाता है।
इसमें मतदाता केवल एक उम्मीदवार को चुनने के बजाय, अपनी पसंद के अनुसार उम्मीदवारों को प्राथमिकता पहली पसंद, दूसरी पसंद, तीसरी पसंद, आदि देते हैं। इसके लिए मतपत्र पर रोमन अंकों का उपयोग किया जाता है। जिन उम्मीदवारों को सबसे अधिक वरीयता वोट मिलते हैं, वे जीत जाते हैं।
MLA के लिए प्रत्यक्ष चुनाव होता है, जिसमें सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार जीतता है। वहीं MLC के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव या नामांकन होता है। इसमें आम जनता सीधे वोट नहीं देती, बल्कि चुने हुए प्रतिनिधि (जैसे MLA, पंचायत प्रमुख और नगर निकाय सदस्य) या कुछ खास समूह (जैसे शिक्षक और स्नातक) वोट देकर इन्हें चुनते हैं।
विजेताओं का फैसला इसी प्राथमिकता-आधारित रैंकिंग सिस्टम से होता है, जिसमें सबसे ज़्यादा पसंद किए जाने वाले (यानी जिन्हें सबसे ज्यादा प्राथमिकता मिलती है) उम्मीदवार सीटें जीतते हैं। मतदान के लिए 'सिंगल ट्रांसफरेबल वोटिंग' (एकल हस्तांतरणीय मतदान) नामक पद्धति का उपयोग किया जाता है।
इसमें मतदाता केवल एक उम्मीदवार को चुनने के बजाय, अपनी पसंद के अनुसार उम्मीदवारों को प्राथमिकता पहली पसंद, दूसरी पसंद, तीसरी पसंद, आदि देते हैं। इसके लिए मतपत्र पर रोमन अंकों का उपयोग किया जाता है। जिन उम्मीदवारों को सबसे अधिक वरीयता वोट मिलते हैं, वे जीत जाते हैं।