बिहार में दारू शुरू होना चाहिए…, शराबबंदी पर अनंत सिंह का बड़ा बयान, बोले- सम्राट चौधरी से बात करेंगे

Bihar Liquor Ban: बिहार में नई सरकार के गठन के साथ ही शराबबंदी कानून को खत्म करने की मांग तेज हो गई है, जिसमें विधायक अनंत सिंह और प्रशांत किशोर के बयान चर्चा में हैं।
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अनंत सिंह, फोटो- सोशल मीडिया
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Anant Singh Statement on Liquor Ban: बिहार में सत्ता की नई पारी शुरू होते ही एक पुराना विवाद फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया है। बाहुबली विधायक अनंत सिंह और प्रशांत किशोर के हालिया बयानों ने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। लोग यह चर्चा कर रहे हैं कि क्या नई सरकार राज्य के खाली खजाने और बढ़ती तस्करी को देखते हुए शराबबंदी कानून पर दोबारा विचार करेगी।

मोकामा के विधायक अनंत सिंह ने हाल ही में विधान मंडल परिसर के बाहर मीडिया से बात करते हुए साफ कर दिया कि बिहार में शराबबंदी अब फायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचा रही है। उन्होंने बहुत बेबाकी से कहा कि राज्य में अब शराब चालू होनी चाहिए क्योंकि इसकी वजह से हालात लगातार बिगड़ रहे हैं। विधायक का मानना है कि शराबबंदी के कारण बिहार में ‘नशा-पानी’ यानी अन्य सूखे और खतरनाक नशीले पदार्थों का प्रचलन बहुत बढ़ गया है, जो युवाओं के स्वास्थ्य के लिए ज्यादा घातक साबित हो रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि वे जल्द ही नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मिलकर इस कानून को वापस लेने या इसमें ढील देने की गुजारिश करेंगे। इसके अलावा, उन्होंने निशांत कुमार को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चा पर भी सकारात्मक रुख दिखाया और उन्हें बच्चा बताते हुए अपना समर्थन देने की बात कही।

जहरीली शराब और तस्करी ने बढ़ाई सरकार की मुश्किलें

शराबबंदी लागू होने के पिछले एक दशक में बिहार ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। कानून के बावजूद राज्य में शराब की होम डिलीवरी की खबरें अक्सर सामने आती रहती हैं और तस्करी का जाल काफी गहरा हो चुका है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात जहरीली शराब से होने वाली मौतें हैं, जिन्होंने कई बार प्रशासनिक मुस्तैदी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। राजस्व के आंकड़ों पर गौर करें तो बिहार को पहले शराब की बिक्री से हर साल लगभग 4 से 5 हजार करोड़ रुपये की आय होती थी। विशेषज्ञों और वित्त विभाग का अनुमान है कि पिछले आठ-नौ वर्षों में राज्य के खजाने को करीब 35 से 40 हजार करोड़ रुपये से अधिक के संभावित राजस्व का नुकसान हुआ है। यह भारी भरकम राशि राज्य के विकास कार्यों में एक बड़ी भूमिका निभा सकती थी।

आर्थिक तंगी के कारण शराबबंदी हटाना मजबूरी या जरूरत

जन सुराज अभियान के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने तो यहां तक दावा कर दिया है कि अगले तीन से चार महीनों के भीतर सरकार शराबबंदी हटाने पर मजबूर हो सकती है। उनका तर्क है कि बिहार इस समय गंभीर आर्थिक दबाव और तंगी से गुजर रहा है। प्रशांत किशोर के अनुसार, राज्य में कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिल रहा है, ठेकेदारों के भुगतान अटके हुए हैं और पंचायत स्तर की योजनाओं के लिए फंड की भारी कमी देखी जा रही है। उनका आरोप है कि बहुमत जुटाने और सत्ता के संघर्ष में हुए भारी खर्च के कारण खजाना खाली हो चुका है। ऐसे में राज्य की अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने और राजस्व बढ़ाने के लिए सरकार को शराबबंदी जैसे बड़े कानून पर कड़ा और व्यावहारिक फैसला लेना पड़ सकता है।

सम्राट चौधरी बदलेंगे बिहार की दस साल पुरानी नीति?

हालांकि जदयू के शीर्ष नेतृत्व ने अब तक यही संकेत दिए हैं कि शराबबंदी कानून को फिलहाल समाप्त नहीं किया जाएगा, लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाली नई सरकार के आने से जनता के बीच उम्मीदों का बाजार गर्म है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और देवेश चंद्र ठाकुर जैसे कद्दावर नेता भी समय-समय पर इस कानून की आलोचना कर चुके हैं और इसमें सुधार की वकालत करते रहे हैं।

अब जब सम्राट चौधरी प्रदेश की कमान संभाल रहे हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वे अपने पुराने सहयोगी की इस महत्वाकांक्षी नीति को उसी रूप में आगे बढ़ाएंगे या फिर अनंत सिंह जैसे विधायकों की मांग पर गौर करेंगे।

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