

Supreme Court On Deepak Prakash Ministerial Post: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार, 31 जुलाई को बिहार सरकार में मंत्री दीपक प्रकाश से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान अदालत ने बिहार सरकार से सवाल करते हुए पूछा कि दीपक प्रकाश विधानसभा और विधान परिषद का सदस्य नहीं होने के बावजूद भी 6 महीने से अधिक समय के लिए मंत्री पद पर कैसे बने हुए हैं। गौरतलब है कि आरएलपी सुप्रीमो उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री हैं।
याचिका पर सुनावई के दौरान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत से याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि छह महीने से अधिक समय हो चुका है। दीपक प्रकाश न ही विधायक और न ही एमएलसी, इसके बावजूद भी वह सरकार में मंत्री बने हुए हैं। याचिकाकर्ता के वकील ने सर्वोच्च न्यायालय से इस मामले में दखल देने की अपील करते हुए कहा छह महीने से अधिक समय के बाद भी दीपक प्रकाश मंत्री बने हुए हैं।
सुनावई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि यह मामला पूरी तरह से कानून से जुड़ा है। बिहार सरकार को इसका जवाब देना होगा कि दीपक प्रकाश कुशवाहा, जो विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं होने के बावजूद भी किस संवैदानिक आधार पर छह महीने से ज्यादा समय तक मंत्री पद पर बने हुए हैं? मंत्री बने रहने की अनुमति देने का आधार क्या है? यह याचिका दीपक प्रकाश के राज्य के विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य न होने के बावजूद बिहार के पंचायती राज मंत्री के तौर पर बने रहने की संवैधानिक वैधता से जुड़ी है।
इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट बिहार सरकार को नोटिस जारी किया था। सामाजिक कार्यकर्ता और व्हिसलब्लोअर राकेश कुमार सिंह की ओर से दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने एक्शन लिया था। इस याचिका में नीतीश कुमार के सीएम के इस्तीफे के बाद बिहार की नई सम्राट चौधरी सरकार में दीपक प्रकाश के मंत्री कै तौर पर नियुक्तित को चुनौती दी गई थी।
याचिका में भारतीय संविधान के आर्टिकल 164 (4) से जुड़ा एक अहम संवैधानिक सवाल उठाया गया है, जो किसी ऐसे व्यक्ति को, जो न तो विधायक है और न ही विधान परिषद का सदस्य है को अधिकत छह महीने तक मंत्री के रूप में काम करने की इजाजत देते है। इस समय के भीतर ही उस व्यक्ति को विधायकि का सदस्य बनना जरूरी होता है।
कोर्ट की टिप्पणी के बाद राजद सुप्रीमो लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने भाजपा पर एनडीए पर निशाना साधा। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने लिखा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा यह पूछा जाना कि 'कोई व्यक्ति 6 महीने से बिना विधायक या एमएलसी बने मंत्री कैसे बना हुआ है? भाजपा नीत एनडीए की सरकार की संवैधानिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल के साथ-साथ भाजपा और एनडीए की गाल पर एक करारा तमाचा भी है। भाजपा-नीत एनडीए सरकार के द्वारा इस पर तत्काल स्पष्ट जवाब दिए जाने की जरूरत है, क्योंकि मामला सीधे तौर पर संवैधानिक प्रावधानों व सर्वोच्च न्यायलय के आदेश के उल्लंघन से जुड़ा हुआ है।
रोहिणी ने अपने पोस्ट में आगे लिखा कि एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य (2001) मामले में माननीय सर्वोच्च अदालत का स्पष्ट आदेश है कि 6 महीने की सीमा को किसी भी राजनीतिक पैंतरेबाजी से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। बावजूद इसके भाजपा नीत सरकार में दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर कब्जा जमा कर बैठने से यही साबित होता है कि भाजपा हमेशा से खुद को और खुद की सत्ता व सरकार को संविधान से ऊपर मानती और समझती रही है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के अनुसार, कोई भी व्यक्ति बिना विधायक (MLA) या विधान पार्षद (MLC) बने अधिकतम 6 महीने तक मंत्री या मुख्यमंत्री के पद पर रह सकता है। इस तय समय-सीमा के भीतर उस व्यक्ति को राज्य के किसी भी एक सदन की सदस्यता हासिल करना अनिवार्य होता है। उदहारण के तौर पर निशांत कुमार को देख सकते हैं। पूर्व सीएम नीतीश कुमार के बेटे निशांत को सम्राट कैबिनेट में स्वास्थ्य मंत्री पद पर नियुक्त किया गया था, हालांकि उस वक्त वह न तो विधायक थे और न ही एमएलसी। लेकिन हाल ही में हुए बिहार विधान परिषद की चुनाव में वह एमएलसी बने और सरकार का अहम हिस्सा है।