घोसी विधानसभा सीट: घोसी सीट पर 38 साल तक रहा एक ही परिवार का राज, इस बार जदयू का मुकाबला वामदल से
Ghosi Assembly Seat: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में घोसी सीट पर जदयू और सीपीआई-माले के बीच कांटे की टक्कर है। 38 साल के पारिवारिक वर्चस्व का अंत और Bihar Politics में वामपंथ का प्रभाव जानें।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
घोसी विधानसभा, (कॉन्सेप्ट फोटो)
Ghosi Assembly Seat Profile: बिहार की राजनीतिक जमीन हमेशा से ही बड़ी उपजाऊ रही है। जहानाबाद जिले की घोसी विधानसभा सीट इसी राजनीति का एक शानदार मंच है। यह क्षेत्र भौगोलिक और सामाजिक रूप से भले ही पूरी तरह से ग्रामीण हो, लेकिन यहाँ की चुनावी लड़ाइयाँ अक्सर राज्य की सुर्खियों में रही हैं।
घोसी विधानसभा क्षेत्र जहानाबाद लोकसभा सीट के अंतर्गत आता है और इसका इतिहास 38 साल के एक अनूठे पारिवारिक वर्चस्व और फिर वामपंथी विचारधारा के उदय की कहानी कहता है।
जगदीश शर्मा परिवार का चार दशक का एकाधिकार
घोसी का राजनीतिक इतिहास 1977 से 2015 तक एक परिवार के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। यह कहानी शुरू होती है जगदीश शर्मा से, जिन्होंने घोसी की राजनीति पर लगभग चार दशक तक अपना एकाधिकार बनाए रखा।
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रिकॉर्ड जीत: 1977 से 2009 तक, शर्मा लगातार आठ बार विधायक चुने गए। यह अपने आप में एक अनोखा रिकॉर्ड है।
दल-बदल का सिलसिला: इस दौरान उन्होंने कई पार्टियों की सीढ़ियां चढ़ीं—जनता पार्टी, भाजपा, कांग्रेस, और जदयू—के साथ-साथ दो बार निर्दलीय भी चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। यह उनकी व्यक्तिगत पकड़ और करिश्माई नेतृत्व को दर्शाता है।
विरासत का हस्तांतरण: जब जगदीश शर्मा 2009 में जहानाबाद से लोकसभा सांसद चुने गए, तो यह सीट उनके परिवार की विरासत बन गई। विधानसभा उपचुनाव में उनकी पत्नी शांति शर्मा निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर विजयी हुईं, और 2010 के अगले विधानसभा चुनाव में उनके बेटे राहुल शर्मा ने जदयू के टिकट पर जीत दर्ज की।
वामदल का प्रभाव और 2020 का उलटफेर
घोसी का राजनीतिक इतिहास सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं है। यहाँ वाम दलों, खासकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन (CPI-ML) का भी गहरा प्रभाव रहा है। सीपीआई ने दो बार जीत दर्ज की थी और माले भी एक बार जीत चुकी थी।
2020 के विधानसभा चुनाव में घोसी में एक बड़ा उलटफेर हुआ, जिसने लगभग चार दशकों के पारिवारिक वर्चस्व को तोड़ दिया। इस चुनाव में महागठबंधन के तहत सीपीआई-माले के उम्मीदवार राम बली सिंह यादव ने जगदीश शर्मा के बेटे जदयू के राहुल कुमार को भारी अंतर से हराया। यह जीत Bihar Politics में वाम दलों की वापसी और स्थानीय सामाजिक समीकरणों में बदलाव का संकेत थी।
2025 का मुकाबला: जदयू बनाम वामदल
आगामी Bihar Assembly Election 2025 में एक बार फिर यह सीट जदयू (NDA) और सीपीआई-माले (महागठबंधन) के बीच सीधी टक्कर का गवाह बनेगी-
सीपीआई-माले: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन ने एक बार फिर राम बली सिंह यादव को अपना उम्मीदवार बनाया है, जो अपनी पिछली जीत को दोहराना चाहेंगे।
जदयू: राम बली यादव का मुकाबला जदयू प्रत्याशी ऋतुराज कुमार से होगा। जदयू इस सीट पर शर्मा परिवार के पुराने आधार को भुनाकर वापस कब्जा करना चाहेगी।
जातीय समीकरण और ग्रामीण राजनीति
घोसी विकास खंड पूरी तरह से ग्रामीण है और 2011 की जनगणना के अनुसार, इसकी कुल आबादी 1,08,130 है। यहाँ का चुनावी गणित काफी उलझा हुआ है। यादव, भूमिहार, रविदास और पासवान समुदाय के मतदाता चुनाव में अहम भूमिका निभाते हैं।
अनुसूचित जाति (SC): अनुसूचित जातियों के वोटरों की संख्या लगभग 19.93 प्रतिशत है, जो किसी भी चुनाव का रुख पलटने की क्षमता रखते हैं।
राम बली सिंह यादव की 2020 की जीत यादव और वामपंथी विचारधारा के वोटों के सफल ध्रुवीकरण का परिणाम थी। इस बार जदयू को एनडीए के समर्थन के साथ इस सामाजिक समीकरण को तोड़ने के लिए एक मजबूत रणनीति की आवश्यकता होगी।
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घोसी विधानसभा सीट Bihar Politics की बदलती तस्वीर को दर्शाती है। जगदीश शर्मा परिवार के 38 साल के लंबे राजनीतिक एकाधिकार का अंत हो चुका है। अब यह लड़ाई एक मजबूत वामपंथी नेता बनाम एक प्रभावशाली क्षेत्रीय पार्टी (जदयू) के बीच है। 2025 के चुनाव में घोसी की जनता यह फैसला करेगी कि वह पारंपरिक पारिवारिक राजनीति की ओर लौटती है, या फिर राम बली सिंह यादव के वामपंथी नेतृत्व को एक बार फिर मौका देती है।
