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अरवल विधानसभा: जहां हर बार पलटती है बाजी, क्या इस बार बदलेगी हार-जीत का रिवाज?
Bihar Assembly Elections: अरवल की कहानी की शुरुआत जहानाबाद से अलग होने के साथ होती है। यह क्षेत्र पहले जहानाबाद जिले का हिस्सा था, लेकिन अगस्त 2001 में इसे एक स्वतंत्र जिले के रूप में पहचान मिली।
- Written By: मनोज आर्या

बिहार विधानसभा चुनाव 2025, (कॉन्सेप्ट फोटो)
Arwal Assembly Constituency: बिहार के 38 जिलों के मानचित्र पर अरवल भले ही एक छोटा-सा नाम हो, लेकिन इसकी मिट्टी में इतिहास का गहरा रंग और राजनीति का एक तीखा मिजाज घुला है। यह ऐसी भूमि है, जहाँ सोन नदी ने किसानों का भाग्य लिखा है और जहाँ की विधानसभा सीट पर हर चुनाव में बाजी पलट जाती है। यह अस्थिरता ही अरवल विधानसभा सीट को Bihar Politics में एक महत्वपूर्ण और अप्रत्याशित चुनावी केंद्र बनाती है।
जहानाबाद से स्वतंत्र अरवल तक
अरवल की कहानी की शुरुआत जहानाबाद से अलग होने के साथ होती है। यह क्षेत्र पहले जहानाबाद जिले का हिस्सा था, लेकिन अगस्त 2001 में इसे एक स्वतंत्र जिले के रूप में पहचान मिली। आज यह जनसंख्या की दृष्टि से राज्य के सबसे कम आबादी वाले (तीसरे) जिलों में गिना जाता है। अरवल मगध क्षेत्र का हिस्सा है और यहीं से इसकी संस्कृति, मगही भाषा और सामाजिक ताना-बाना तय होता है।
इस जिले की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से खेती पर निर्भर है। यहां उद्योग की कमी है, लेकिन सोन नदी के कारण यहां की जमीन बेहद उपजाऊ है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में यहां 3 कॉलेज, 39 हाई स्कूल, 5 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 47 उप स्वास्थ्य केंद्र मौजूद हैं, लेकिन चुनौतियां अभी भी कायम हैं।
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राजनीतिक अस्थिरता का लंबा इतिहास
अरवल विधानसभा सीट 1951 में स्थापित हुई थी और यह जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है। इस सीट की राजनीति हमेशा से ही अस्थिर रही है। अब तक अरवल से कुल 17 बार विधायक चुने जा चुके हैं, और हर बार मतदाता ने किसी एक दल पर लंबे समय तक भरोसा नहीं जताया।
निर्दलीयों का वर्चस्व: निर्दलीय उम्मीदवारों ने 4 बार जीत दर्ज की है। सबसे उल्लेखनीय नाम निर्दलीय उम्मीदवार कृष्णानंदन प्रसाद सिंह का है, जिन्होंने 1980 से 1990 तक लगातार तीन बार जीत हासिल की।
दलों का संघर्ष: राजद, एलजेपी, भाकपा और कांग्रेस ने 2-2 बार, जबकि भाजपा, जनता दल, जनता पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी ने 1-1 बार सफलता प्राप्त की है। कांग्रेस की आखिरी जीत 1962 में हुई थी, जो उसकी कमजोर होती पकड़ को दर्शाता है।
पिछले तीन चुनाव के नतीजे
अरवल की राजनीति में अस्थिरता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि पिछले चार विधानसभा चुनावों में चार अलग-अलग दलों ने जीत दर्ज की है।
- 2010: भाजपा के चितरंजन कुमार विधायक बने।
- 2015: राजद के रविंद्र सिंह ने जीत हासिल की।
- 2020: भाकपा (माले) (लिबरेशन) ने यह सीट जीती।
2020 के विधानसभा चुनाव में सीपीआईएमएल के महानंद सिंह ने भारतीय जनता पार्टी के दीपक शर्मा को बड़े अंतर से हराया। यह जीत महागठबंधन के लिए वामपंथी विचारधारा और सामाजिक न्याय की ताकतों के एकजुट होने का प्रतीक थी।
2025 विधानसभा का सियासी मुकाबला
आगामी Bihar Assembly Election 2025 में सीपीआईएमएल (CPI-ML) के सामने सबसे बड़ी चुनौती बदलाव की इस परंपरा को तोड़ने और अपनी सीट को बरकरार रखने की होगी। महानंद सिंह को न केवल भाजपा से कड़ी चुनौती मिलेगी, बल्कि उन्हें स्थानीय मुद्दों- जैसे उद्योग की कमी, खेती से जुड़ी समस्याएं और बेरोजगार पर भी जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना होगा।
राजद और वाम दल के बीच गठबंधन के बावजूद, अरवल के वोटर हमेशा से ही अप्रत्याशित रहे हैं। यह बिहार राजनीतिक में एक ऐसी सीट है, जहां पार्टी के नाम से ज्यादा उम्मीदवार का चेहरा और स्थानीय समीकरण मायने रखते हैं।
ये भी पढ़ें: कुर्था विधानसभा: समय के साथ इस सीट पर बदली सियासी हवा, समाजवादी विरासत से चुनावी दंगल की कहानी
वामपंथ की वैचारिक लड़ाई की अग्निपरीक्षा
अरवल विधानसभा सीट बिहार की एक ऐसी सीट है, जहां की जनता ने हर बार बदलाव को तवज्जो देकर अपनी राजनीतिक चेतना का परिचय दिया है। सोन नदी के उपजाऊ मैदानों की तरह ही यहां की राजनीति भी हमेशा उथल-पुथल भरी रही है। 2025 का चुनाव इस बात का फैसला करेगा कि क्या सीपीआईएमएल बदलाव की परंपरा को तोड़ पाती है, या एनडीए फिर से बाजी पलटता है।
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