Trump on Operation Sindoor: शहबाज शरीफ और डोनाल्ड ट्रंप के रिश्तों में इस समय असहजता साफ दिखाई दे रही है। हालात ऐसे बन गए हैं कि न तो दूरी बनाई जा सकती है और न ही सहजता कायम रह पा रही है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान द्वारा अमेरिका से हस्तक्षेप की अपील करना अब उसके लिए भारी पड़ता दिख रहा है। उस समय वॉशिंगटन से मदद की उम्मीद की गई थी, लेकिन अब उसी प्रसंग को लेकर सार्वजनिक मंचों पर टिप्पणियां हो रही हैं, जिससे इस्लामाबाद की किरकिरी हो रही है।
अप्रैल-मई के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने शहबाज शरीफ को “अच्छा आदमी” बताया था और दोनों देशों के रिश्तों को सकारात्मक दिशा में दिखाने की कोशिश की थी। पाकिस्तान ने भी ट्रंप की सराहना करते हुए उन्हें भारत-पाक तनाव कम कराने में अहम भूमिका निभाने वाला नेता बताया। हालांकि हालिया अमेरिकी कांग्रेस के विशेष सत्र में ट्रंप के बयान ने स्थिति बदल दी। अपने भाषण में उपलब्धियां गिनाते हुए उन्होंने दावा किया कि उनके हस्तक्षेप के बिना भारत-पाक संघर्ष गंभीर रूप ले सकता था।
मैं नहीं होता तो मारे जाते शहबाज
डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्होंने दस महीनों में आठ संभावित युद्ध रुकवाए, जिनमें कंबोडिया-थाईलैंड के बाद भारत-पाकिस्तान का जिक्र किया। उन्होंने इसे परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की आशंका वाला टकराव बताया। इसी संदर्भ में उन्होंने यह भी कहा कि कई लोगों का मानना था कि अगर अमेरिका बीच में न आता, तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की जान को खतरा हो सकता था। यह बयान पाकिस्तान के लिए असहज करने वाला रहा, क्योंकि इससे उसकी आंतरिक सुरक्षा और सैन्य क्षमता पर सवाल उठते दिखे।
ट्रंप के बयानों के पाकिस्तानी सेना की भी किरकिरी
विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की टिप्पणी से पाकिस्तान की सेना और नेतृत्व दोनों की छवि प्रभावित होती है। यदि किसी देश के प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठे, तो वह राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा बन जाता है।
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कुछ दिन पहले गाजा बोर्ड ऑफ पीस की बैठक में भी शहबाज शरीफ की मौजूदगी चर्चा में रही, जहां उन्होंने अमेरिका के साथ सहयोग की बात दोहराई। लेकिन ट्रंप के हालिया बयान ने दोनों नेताओं के समीकरणों को नए सिरे से बहस के केंद्र में ला दिया है।