Strait Of Hormuz Dispute: अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीते 18 अगस्त 2026 को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर एक बड़ा दावा किया। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर होर्मुज स्ट्रेट का नक्शा साझा करते हुए उसे अमेरिका का हिस्सा घोषित कर दिया। उनके इस पोस्ट के बाद पूरी दुनिया में हलचल तेज हो गई।
अमेरिकी राष्ट्रपति इससे पहले भी कनाडा, ग्रीनलैंड, वेनेज़ुएला और क्यूबा को इसी प्रकार अमेरिका हिस्सा बता चुके हैं। लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग था, क्योंकि ट्रंप के पोस्ट से पहले अमेरिकी मीडिया आउटलेट सीएनएन ने अपनी एक रिपोर्ट पेश की। इसमें सीएनएन ने दावा किया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान की पकड़ पहले के मुकाबले कमजोर हो गई है और अब रास्ते से गुजरने वाले जहाजों पर अमेरिकी नेवी का लगभग 80 से 90 प्रतिशत नियंत्रण है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में ईरान की पकड़ होर्मुज पर कमजोर हो गई है? क्या होर्मुज पर अमेरिका का नियंत्रण हो गया है? अमेरिकी मीडिया का दावा कितना सच है?
ईरान ने मार्च 2026 से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी कर रखी है। ईरान यहां अमेरिकी और सहयोगी देशों के जहाजों को लगातार निशाना बना रहा है। युद्ध शुरू होने से पहले इस रास्ते से हर दिन लगभग 130-140 जहाज बिना किसी खतरे के गुजरते थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर सिर्फ 5-6 रह गई है। ईरान की नाकेबंदी के बाद ऐसा एक भी दिन नहीं बीता जब इस रास्ते से एक दिन में 10 जहाज गुजरे हों। इस नाकेबंदी दुनिया भर में तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई और कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं।
ईरान द्वारा नाकेबंदी लगाए जाने के कुछ हफ्तों तक अमेरिका ने इस रास्ते को फिर से खुलने की कई कोशिश की, लेकिन अमेरिकी सेना ईरान की नाकेबंदी को पूरी तरह से खत्म करने में नाकामयाब रही। नतीजतन कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गए। जबकि नाकेबंदी से पहले कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में 65-70 डॉलर प्रति बैरल पर बिक रहा था। यानी तेल की कीमतों में भारी उछाल आया जो अभी भी जारी है, वर्तमान में भी क्रूड ऑयल 84 से 88 डॉलर प्रति बैरल के बीच चल रही है।
अमेरिका और ईरान के युद्ध में एक बड़ा मोड़ 17 जून 2026 को आया। इस दिन दोनों देशों ने युद्धविराम समझौते (MoU) पर साइन किए। इसके तहत ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलना था और दो महीने तक कोई शुल्क नहीं लेना था और बाद में खाड़ी देशों और ओमान के साथ मिलकर जलमार्ग का प्रबंधन करने की योजना थी। ईरान ने समझौते के अगले ही दिन जहाजों के गुजरने के लिए रास्ता बताने वाला एक नक्शा जारी किया। लेकिन अमेरिका ने जहाजों की सुरक्षा के लिए युद्धपोत तैनात किए, जबकि ईरान अपने तय रास्ते से जहाज चलाने पर अड़ा रहा। इससे फिर तनाव बढ़ गया।
इस दौरान होर्मुज पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए अमेरिका ने बड़ी नौसैनिक ताकत तैनात की है। इसमें यूएसएस अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप, परमाणु पनडुब्बी और मिसाइल क्रूजर शामिल हैं। यूएसएस बॉक्सर भी क्षेत्र में मौजूद है। लंबे समय तक अभियान जारी रखने के लिए यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन को लिंकन की जगह भेजा जा रहा है। इससे यह साफ हो गया कि अमेरिका होर्मुज के मोर्चे पर किसी भी हाल में ईरान से पिछड़ने वाला नहीं है।
सीएनएन ने शिपिंग एनालिटिक्स कंपनी केप्लर के आंकड़ों के आधार पर हाल ही में एक रिपोर्ट पेश की। इसमें सीएनएन ने बताया कि ईरान की पकड़ कमजोर हो रही है। पिछले दो हफ्तों में होर्मुज से गुजरने वाले करीब 80 प्रतिशत जहाज ओमान की तरफ बने अमेरिकी नियंत्रित रास्ते से गए। हालांकि सीएनएन ने अपनी रिपोर्ट में यह नहीं बताया कि पिछले दो हफ्तों में होर्मुज पार करने वाले जहाजों की कुल संख्या कितनी थी? क्योंकि युद्ध शुरू होने के बाद से इस रास्ते से गुरजने वाले जहाजों की संख्या बहुत कम है। रोजाना केवल पांच से सात जहाज गुजर रहे हैं, इसलिए 80 प्रतिशत का मतलब केवल चार से छह जहाज हो सकता है।
इसके अलावा केप्लर के आंकड़ों की एक और सीमा है। ईरानी हमलों से बचने के लिए कुछ जहाज अपने ट्रांसपोंडर बंद कर देते हैं। ट्रांसपोंडर बंद होने पर जहाजों की सही स्थिति ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे जहाजों को केप्लर भी ट्रैक नहीं कर सकता। इसलिए उपलब्ध आंकड़े होर्मुज में वास्तविक जहाजों की संख्या पूरी तरह नहीं बताते। संभव है कि समुद्र में मौजूद जहाजों की वास्तविक संख्या आधिकारिक आंकड़ों से कुछ अलग हो।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर इस समय ईरान और अमेरिका दोनों ने नाकेबंदी कर रखी है। इसका असर पूरी दुनिया के साथ ईरान की अर्थ अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। बंदर अब्बास जैसे प्रमुख बंदरगाहों पर व्यापार लगभग रुक गया है। पहले यहां से चीन अपने जहाजों के जरिए व्यापार कर रहे थे, लेकिन अब वह भी यहां आने से बच रहे हैं। 13 अगस्त तक कम से कम 59 ईरान जाने वाले जहाजों ने अपना रास्ता बदल लिया। इससे ईरान के आयात और निर्यात दोनों पर दबाव बढ़ा है।
ईरान के पास समुद्री व्यापार की कमी को पूरी तरह भरने के लिए आसान विकल्प नहीं हैं। तुर्की, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे पड़ोसी देशों से उसकी जमीनी सीमाएं कई जगह पहाड़ी और कठिन हैं। बड़े पैमाने पर व्यापार को इन रास्तों से चलाना मुश्किल है। पाकिस्तान के साथ पेट्रोल और डीजल की कुछ तस्करी जरूर होती है, लेकिन वह सामान्य कानूनी व्यापार की जगह नहीं ले सकती। कैस्पियन सागर का रास्ता भी मुख्य रूप से रूसी हथियार और सैन्य सामान लाने में उपयोग हो रहा है।
17 अगस्त को युद्धविराम आधिकारिक रूप से समाप्त हो गया। फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, अगर अमेरिका होर्मुज की नाकेबंदी जारी रखता है, तो ईरान की आर्थिक स्थिति और खराब हो सकती है। हालांकि इसके बाद भी ईरान की ओर से ऐसे संकेत नहीं मिले हैं कि वह किसी भी स्थिति में होर्मुज से अपनी नाकेबंदी खत्म करेगा। हाल ही में ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने मोहसिन रेजाई को सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल (SNSC) का सचिव बनाया।
रेजाई ने पद संभालते ही सबसे पहला बयान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर दिया। उन्होंने कहा कि ईरान किसी भी स्थिति में अमेरिका या किसी के भी दबाव में आकर होर्मुज की नाकेबंदी नहीं खोलेगा। मोहसिन रेजाई ने यह भी कहा कि वो इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार का समझौता करने के लिए ट्रंप का कार्यकाल खत्म होने यानी 2029 तक का इंतजार कर सकते हैं। रेजाई के बयान से स्पष्ट है कि ईरान फिलहाल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के मुद्दे पर पीछे नहीं हटना चाहता।