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पाकिस्तान में इंसुलिन ग्लुलिसिन की कमी, जर्मनी से सप्लाई प्रभावित।
निर्माता कंपनी के अपग्रेड के कारण अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति बाधित।
इंसुलिन की सप्लाई 3,500 किट से घटकर 1,000 किट रह गई।
Pakistan Insulin Shortage: पाकिस्तान में टाइप-1 डायबिटीज के मरीजों के लिए इस्तेमाल होने वाली एक विशेष प्रकार की इंसुलिन की कमी हो गई है। स्वास्थ्य मामलों के संसदीय सचिव नेल्सन अजीम ने शुक्रवार को संसद में इसकी जानकारी दी। उनके मुताबिक, जर्मनी में निर्माता कंपनी द्वारा उत्पाद को अपग्रेड करने के कारण अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसका असर पाकिस्तान के अलावा एशिया, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कुछ हिस्सों में भी महसूस किया जा रहा है।
नेशनल असेंबली में सांसद सैयदा आमना बतूल के सवाल का जवाब देते हुए अजीम ने बताया कि जून तक देश में इंसुलिन की कमी नहीं थी और सितंबर तक का स्टॉक उपलब्ध था। लेकिन अक्टूबर में जर्मनी से सप्लाई बाधित होने के बाद परेशानी सामने आई। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति बहाल होने पर संबंधित उत्पाद दोबारा उपलब्ध हो सकेगा।
अजीम के अनुसार, पाकिस्तान में इसी तरह काम करने वाली दूसरी इंसुलिन उपलब्ध हैं। मरीज डॉक्टर की सलाह पर इनका इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि, सांसद बतूल ने चिंता जताई कि दवा बदलने से मरीजों को परेशानी हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि विकल्प वाली दवाएं कम से कम 20 प्रतिशत महंगी हैं और कई मरीजों के लिए डॉक्टर तक पहुंचना आसान नहीं है।
संसदीय सचिव ने बताया कि जर्मन कंपनी ने पहले 3,500 किट की आपूर्ति की थी, जो घटकर 1,000 किट रह गई। कंपनी की अपग्रेड प्रक्रिया लगभग एक साल तक चल सकती है, जिससे उपलब्धता पर और असर पड़ने की आशंका है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने आयातकों और वितरकों से वैकल्पिक व्यवस्था करने को कहा है, हालांकि उत्पादन रुकने के कारण यह चुनौतीपूर्ण है।
पाकिस्तान के स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता साजिद शाह ने स्पष्ट किया कि फिलहाल समस्या इंसुलिन ग्लुलिसिन की है, जो एपिड्रा ब्रांड के नाम से उपलब्ध होती है। उन्होंने बताया कि इंसुलिन एस्पार्ट (नोवोरैपिड) और इंसुलिन लिस्प्रो (ह्यूमालॉग) जैसी दूसरी रैपिड-एक्टिंग इंसुलिन देशभर में उपलब्ध हैं। मंत्रालय के अनुसार, इंसुलिन की अन्य प्रमुख श्रेणियों की भी कमी नहीं है।
इससे पहले अगस्त 2025 में पाकिस्तान मेडिकल एसोसिएशन ने जरूरी दवाओं की गंभीर कमी पर चिंता जताई थी। एसोसिएशन के मुताबिक, उस समय कम से कम 80 महत्वपूर्ण दवाएं उपलब्ध नहीं थीं, जिनमें 25 के विकल्प भी नहीं थे। इनमें डायबिटीज, कैंसर, हृदय रोग और अन्य गंभीर बीमारियों के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाएं शामिल थीं।