ईरान में खामेनेई शासन के खिलाफ विद्रोह (सोर्स-सोशल मीडिया) 
विदेश

Iran Protests: 78 शहरों में फैली आग, 'मुल्लाओं' के अंत के नारे, खामेनेई शासन के खिलाफ महासंग्राम

Khamenei Regime Crisis: ईरान के 78 शहरों में खामेनेई शासन के खिलाफ विद्रोह तेज हो गया है। आर्थिक संकट और महंगाई से भड़की इस आग में अब तक 35 मौतें हुई हैं। छात्र मुल्ला शासन के अंत की मांग कर रहे हैं।

प्रिया सिंह

Anti-Government Protests in Iran: ईरान में पिछले 10 दिनों से जारी विरोध प्रदर्शनों ने अब एक भीषण जन-विद्रोह का रूप ले लिया है, जो देश के 31 प्रांतों के 78 से अधिक शहरों में फैल चुका है। आर्थिक तंगी और मुद्रा रियाल की ऐतिहासिक गिरावट से शुरू हुआ यह आंदोलन अब सीधे तौर पर सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के शासन को उखाड़ फेंकने की मांग में बदल गया है। प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़पों में अब तक 35 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें मासूम बच्चे भी शामिल हैं और 1,200 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी के बाद यह संकट अब वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आ गया है, जिससे क्षेत्र में भारी अस्थिरता का खतरा मंडरा रहा है।

आर्थिक बदहाली से उपजा आक्रोश

ईरान की मुद्रा रियाल में डॉलर के मुकाबले भारी गिरावट आई है, जिससे बाजार में महंगाई बेकाबू हो गई है और आम जनता की क्रय शक्ति आधी रह गई है। व्यापारियों और दुकानदारों ने तेहरान के ग्रैंड बाजार सहित देश के कई हिस्सों में हड़ताल कर अपनी दुकानें बंद रखी हैं, जो शासन की आर्थिक नींव पर सीधा प्रहार है। विश्लेषकों का मानना है कि सालों के कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार ने लोगों को इस हद तक मजबूर कर दिया है कि वे अब सड़कों पर मरने-मारने को उतारू हैं।

यूनिवर्सिटी और छात्रों का विद्रोह

ईरान के युवा और छात्र इस आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर 'तानाशाह मुर्दाबाद' और 'मुल्लाओं को दफन करो' जैसे तीखे नारे लगा रहे हैं। तेहरान की तर्बियत मोदारेस यूनिवर्सिटी और खाजेह नसीर यूनिवर्सिटी के छात्रावासों में छात्र एलीट फोर्स IRGC की तुलना आतंकी संगठन ISIS से कर रहे हैं। इन छात्रों का मानना है कि जब तक देश में धार्मिक कट्टरपंथियों का शासन रहेगा, तब तक ईरान एक आधुनिक और खुशहाल राष्ट्र नहीं बन पाएगा।

नेतृत्वहीन आंदोलन की ताकत

इस जन-आंदोलन का कोई एक बड़ा चेहरा या राजनीतिक दल नहीं है, जो इसे और भी अधिक अनिश्चित और खतरनाक बनाता है। शुरुआत में व्यापारियों के विरोध से पैदा हुई यह लहर अब पानी की कमी और मानवाधिकारों के हनन जैसे व्यापक मुद्दों को समेट चुकी है। हालांकि कुछ लोग इसे अपदस्थ शाह के बेटे रजा पहलवी का समर्थन प्राप्त मानते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर यह आम जनता की एक स्वतःस्फूर्त और बहुस्तरीय नाराजगी का परिणाम है।

सुरक्षा बलों की बर्बरता और दमन

खामेनेई शासन ने आंदोलन को कुचलने के लिए घातक हथियारों और व्यापक बल प्रयोग का सहारा लिया है, जिससे मरने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इंटरनेट पर पाबंदियों और भारी घेराबंदी के बावजूद, प्रदर्शनकारी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं और केरमानशाह जैसे शहरों में पुलिस को पीछे हटने पर मजबूर कर रहे हैं। सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई ने आग में घी डालने का काम किया है, जिससे मध्यम वर्ग और ट्रक चालकों जैसे नए समूह भी इस जंग में शामिल हो गए हैं।

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